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जिंदगी के दस्ताने

कितना संभालना चाहते हैं  इस जिंदगी को  पर यह जिंदगी है  संभलती नहीं है। एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा लिया, पर यह किस्मत है बदलती नहीं। जाने क्यों सर्दियों-सी बैठी यह ज़िंदगी ठिठुरती रहती है, और गर्मियों की तपिश-सी बातें सुन अक्सर झुलसती रहती है। काश कभी पड़ जाती इस पर भी नरम ओस की बूँद, नरम-सी बारिश की छुवन— और मैं भी कुछ पल को अपनी पलकों को मूँद लेती। जैसे हाथ रहते हैं सुरक्षित दस्तानों के भीतर, वैसे ही मैंने भी ज़िंदगी के लिए दस्ताने सी लिए। अब फुर्सत मिली है उन्हें दिखाने की, कड़ी धूप और कड़ी ठंड से ज़िंदगी को बचाने की। बड़ी मुश्किल से सिए हैं इन्हें, अब खो न पाऊँगी। फट भी गए तो बार-बार सीती जाऊँगी। क्योंकि शायद कुछ ज़्यादा ही मोटे हैं जो हमने पहने हैं— ये ज़िंदगी के दस्ताने। ज़िंदगी के दस्ताने।
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अनसुनी पीर

लिखूँ या न लिखूँ तुम कहाँ पढ़ोगे? दर्द है, यह सच है तुम कहाँ देखोगे? जो खुद नहीं देखा उसे किसी तीसरे से क्या कहोगे? आह की आवाज़ होती तो सुनते, दिल की पीर तुम कहाँ सुनोगे? और जब तक तुम पढ़ोगे, देखोगे, बोलोगे, सुनोगे— तब तुम उसे इस धरा पर न पाओगे।

कोई शुभकामना कुबूल न होगी...

नारी तुम तो नारी हो, न अबला न बेचारी हो। लक्ष्मी हो तुम, तुम ही विद्या हो, तुम ही नवदुर्गा शक्ति स्वरूपा हो। जिंदगी का आरंभ तुमसे, जिंदगी का अंत तुम हो। इक मकान का मालिक होता है पुरुष पर, उसको घर बनाने का मंत्र, नारी तुम हो। तुम न अपनों से हारी हो, न तुम अपने सपनों की मारी हो। तुम हर काम की शुरुआत हो  और तुम हर जंग की तैयारी हो। नारी तुम तो नारी हो। ये जो बोला सब सच है क्या, क्या इसमें रत्तीभर का भी झूठ नहीं? सच बताओ तुम सर्वेसर्वा हो इस जग की या इस तेरे जग में, तेरे घर में तेरी कोई पूछ नहीं। एक बार मनन करके देखो, जैसा कहती हूँ वैसा करके देखो - एक बार सुंदर-सुकुमल बनना, तुम देखना, तुम तब भी कुचली जाओगी। फिर सबल सुदृढ़ बनकर देखना, तुम तब भी ताने पाओगी। साल भर रोने वाली तू नारी तुम कुछ नहीं बस भोली हो! तुम्हें हर मज़ाक में सिरदर्द कहने वालों की तुम हर मर्ज की गोली हो। तुम घर की लाज शर्म हया हो, तो कभी दिल बहलाने वाली अदा हो। कभी सात फेरों की वफ़ा हो, तो कभी घर बचाने वाली सदा हो। तुम जिम्मेदारी उठाने वाला कांधा हो, तुम बॉस की फटकार निकालने का जरिया हो। तुम कभी उसकी गलतियों का पुतला हो...

पर दिल की हर आँख बहती थी...

उस दिन उस एक मय्यत पर हमने  एक अपने को नहीं अपने पूरे परिवार को खोया था। जिसको सोचकर सोचकर ही दिल, आत्मा, मेरा वजूद तक रोया था। मैं दौड़ा था उसको कुछ पल थामने के लिए, अपनी यादों में उसकी झलक बांधने के लिए। उसकी ठंडी पड़ी उंगलियों को अपने कलेजे पर रखना चाहा था, उसके जाने के गम की जलन कुछ-कुछ मिटाने के लिए। पर कदम पड़े जब उस चौखट पर तो, वहां उसका नामोनिशान तक न था। खामोश धरती थी, खामोश आसमान था, पर उस गली, उस शहर में उसका कोई सामान तक न था। मैं पहुंचा, मैंने पूछा कहां गया वो, जिससे मिलने मैं दौड़-दौड़कर आया हूँ? कुछ नहीं बस अपनी यादें, अपने गम, अपनी नम पलकें मैं लाया हूँ। वो सुनसान सा आंगन,  उसमें बस ब्रूनो का भौंकना, हर होती आहट पर बस  एक उस कुत्ते का चौंकना। बस एक उसकी आँखों में मुझे किसी के आने की आस दिखती थी, बस एक उसकी आँखों में मुझे  अपने मालिक को पाने की प्यास दिखती थी। बाकी तो हर कोई बस बात बता रहा था, वो राज था या हकीकत कुछ समझ कहां आ रहा था। मैं बस एक तस्वीर बनाता रहा अपने जेहन में, कोई उसे हार्ट अटैक तो कोई जहर बता रहा था। कोई नील कह रहा था, कोई सेहत की ढील ...

हर अंजान राहगीर भी अपना कहेगा...

मैं आज़ाद हूँ सोचकर मैंने पंख फैलाए थे, आँख खुली तो पाया वो नीले आसमान तो मेरे सपने में आये थे। तू सुकून में है सोच मुझे जन्नत सी खुशी मिलती है, मैं संतुष्ट हूँ कि मैंने अपने नियम तेरी सहमति से बनाए थे। तू निश्चिंत था सोचकर कि तूने मेरे पंख पकड़े हैं, पर तुझे खबर नहीं वो निशान मेरे गले पर दिख रहे हैं। गम को देते देते बक्शीश हम थक गये हैं, और तू कहता है कि हम खुशी खरीदने में बिक गये हैं। अब न अश्क़ बचें हैं, न सिसकियां बचीं हैं, न कोई मुलाकात करता है, न हिचकियां बचीं हैं। जीने की ख्वाहिश की खबर लेने वालों तुम क्या जानो बस मरने की आरजू और झिझकियां बचीं हैं। जिस दिन चली गई यह झिझक यकीन मानो एक जनाजा जरूर इस चौखट से उठेगा। आज तन्हा रहने वाली इस रूह को उस पल सड़क से गुजरता हर अंजान राहगीर भी अपना कहेगा... हर अंजान राहगीर भी अपना कहेगा...

वक्त का वक्त

जब वक्त नहीं रुकता कभी, फिर वो मुझे क्यों रोकता है? खुद नहीं हटता पीछे,  तो मुझे क्यों अतीत में झोंकता है? मैं नहीं टोक सकती उसे मुझे पता है, फिर क्यों हर कदम पर वो मुझे टोकता है? अधर में फंँसाकर मेरी जिंदगी को वो क्यों मुस्कुराता हंँसता है? कोई पूछे न पूछे उससे  मेरे साथ उसके इस अन्याय को करने की वजह जो जख्मी है, वो मेरा हृदय है, वो उससे यह प्रश्न पूछता है- मैंने कब कहा था मुझे हर पल मुस्कुराना है? मैंने कब कहा था मुझे हर खुशी को पाना है? मैंने कब कहा था मुझे रहने को महल बनाना है? मैंने कब कहा था मुझे हर ख्वाब को अपना बनाना है? और जो कहती हूँ वो कोई सुनता कहाँ है, मेरे अपनों का सुकून मेरा मुस्कुराना है, झूमना उनका खुशी में मेरा खुशी को पाना है। जहाँ हों मेरे अपने उस झोपड़ी को महल मानती हूँ, उनकी पलकों के हर ख्वाब को ही मैंने अपना बनाना है। मैं सब जानती हूँ, तू भी तो जलन में जलता है, तू भी नहीं देता किसी को सबकुछ क्योंकि तुझे ही कब कहाँ सब-कुछ मिलता है? तुझे अपशब्द कहने वालों की कमी नहीं है, तेरा गुणगान करने वाले तेरा साथ छोड़ देते है कहते हैं तू गिरगिट से भी जल्दी रंग बदलता ह...

बस वक्त बीता है!

छूट गई जिंदगी, जिंदगी की खोज में, खोके जिंदगी मैं आज आई हूँ होश में। बड़ी मुद्दत से उसको चाहूंगी सोचा था, खुद की ख्वाहिश ही भूल गई मैं जोश-जोश में। कभी अभाव की नमी थी आँखों में, आज आँखों में सुकून की कमी है। कौन कहता है मुझे पूरी दुनिया देखनी है, मेरे लिए तो पूरी दुनिया मेरे घर की ही जमीं है। मेरे बच्चों ने जो इस घर में तूफान लाया है, मुझे उसमें भी समंदर-सा मज़ा आया है। उनकी किलकारियों को महसूस किया तो लगा, मेरा खोया हुआ बचपन लौट आया है। जो कहता है यह सब मोह माया है- उससे पूछती हूँ, जब प्रीत नहीं हृदय में तो मानव-जीवन ही क्यों पाया है? क्यों पाषाण-सा बनाकर तुझे भेजा नहीं उसने, जो पाषाण को मानव में बदलने इस ज़मीं पर स्वयं आया है? बदलते वक्त में भाव जरूर बदले हैं, पर हृदय का धड़कना कहां बदल पाया है? वक्त बदला है, वक्त के साथ बदलने के लिए, पर चौबीस घंटों की सीमा कौन बदल पाया है? कभी लगा पैसों से चलती है जिंदगी, तो कभी लगा पैसों ने जिंदगी को मिटाया है? अब उलझन में हूँ मैं कि मैंने जिंदगी में पैसों को खाया है, या इन पैसों ने मेरी जिंदगी को खाया है? जिंदगी की हर रोज की जंग में, मुश्किल है सम...