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जिंदगी के दस्ताने


कितना संभालना चाहते हैं 
इस जिंदगी को 
पर यह जिंदगी है 
संभलती नहीं है।

एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा लिया,
पर यह किस्मत है
बदलती नहीं।

जाने क्यों सर्दियों-सी बैठी
यह ज़िंदगी ठिठुरती रहती है,
और गर्मियों की तपिश-सी बातें सुन
अक्सर झुलसती रहती है।

काश कभी पड़ जाती इस पर भी
नरम ओस की बूँद,
नरम-सी बारिश की छुवन—
और मैं भी कुछ पल को
अपनी पलकों को मूँद लेती।

जैसे हाथ रहते हैं सुरक्षित
दस्तानों के भीतर,
वैसे ही मैंने भी
ज़िंदगी के लिए
दस्ताने सी लिए।

अब फुर्सत मिली है
उन्हें दिखाने की,
कड़ी धूप और कड़ी ठंड से
ज़िंदगी को बचाने की।

बड़ी मुश्किल से सिए हैं इन्हें,
अब खो न पाऊँगी।
फट भी गए तो
बार-बार सीती जाऊँगी।

क्योंकि शायद
कुछ ज़्यादा ही मोटे हैं
जो हमने पहने हैं—

ये
ज़िंदगी के दस्ताने।
ज़िंदगी के दस्ताने।






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