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हिंदी की पीड़ा

साल भर बाद आज, 
निकलकर वो बाहर आई।
मैंने कहा बहन तुमको
हिंदी दिवस की बहुत बधाई।
और पूरे जोश से पूछा - "कैसी हो हिंदी?"
अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन आदि वायरस के बीच,
मुझे लगा तुम नहीं बची,
पर हर्ष हुआ, तुम तो हो आज भी जिंदी!
उसने जो कहा, उसे सुन दिल टूट गया,
ऐसा लगा जैसे अपना कोई हो छूट गया।
उसका दर्द बड़ा ही गहरा था,
उसको गैरों ने नहीं ठगा था,
कोई अपना ही था उसे जो लूट गया।

उसने कहा-
"कैसे कहूं! कैसी है यह हिंदी!"
जो थी कभी मां के माथे की बिंदी-सी,
अब है थोड़़ी मृत, थोड़ी जिंदी-सी।
थोड़ी इंग्लिश हुई, थोड़ी हिंग्लिश हुई,
बस थोड़ी ही बची वो हिंदी-सी।
बस यह कह वो खामोश हुई,
और मुझसे बहुत कुछ कह-सी गई।
उसके अलविदा में कोई खुशी न थी,
वो गई वहां से पर, कुछ वहीं पर रह-सी गई। 

वो सबके लिए एक भाषा है,
पर उसको भी हमसे आशा है।
सांस उसे कुछ कम-सी हैं,
मृत होती वो, उसको बहुत निराशा है।
पहले वो बोली, माँ की बोली थी।
पूजनीय थी वो जैसे, पूजा के थाल में रोली थी,
वो दिए-सी जलती दिवाली थी,
वो रंगों से भरी होली-सी थी।
संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट,
और न जाने कितने झूलों में खेली थी।
पर भाव नहीं वो भूली अपना,
चाहे जितने दंशों को झेली थी।

नवजात हुए तुम, भाषा को तरसे,
बोल मिले तुमको हिन्दी के, अपने ही घर से।
शिक्षा ली तुमने, न जाने तुम क्या सीख गए,
अपनाई भाषा पराई न जाने किस डर से।
अब सबल-समर्थ तुम, उसे क्यों चाहोगे,
क्यों उसे अपनी पहचान बनाओगे।
माँ की बोली क्यों बोलोगे,
खुद को खरीदी भाषा सिखलाओगे।
एहसान करके उसपर, उसका मन रखने को,
तुमने उसका जन्मदिवस-सा मना ही दिया।
एक बार नहीं सोचा तुमने कि पूरे साल,
तुमने कैसा उससे व्यवहार किया।
आज समझ आया मुझे वह कारण,
कि क्यों यह दिन श्राद्धों में ही आता है।
क्यों इसको पूरे साल का कोई 
और शुभ दिन नहीं भाता है।
आज यही और यहीं तुम यह प्रण कर लो,
माँ-बाप को भी न कभी बिसराओगे।
और उसी तरह हिंदी को भी,
पूरे साल भर अपने हृदय से लगाओगे।
उसकी बोली में माँ की ममता,
पिता का दुलार पाओगे।
हिंदी नाराज़ हो तुमको छोड़ भी दे पर,
तुम कह दो उसे - 
तुम हिंदी को न छोड़ पाओगे...
तुम हिंदी को न छोड़ पाओगे...

                                  







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