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माँ सरिता (नदी)

आज गुरुजनों के सानिध्य में बिताए कुछ पलों में ऐसी शांति मिली कि बहुत दिनों बाद जीवन को समझने को कुछ पल मिल गए। गुरु छाया मुझ पर सदैव बनी रहे। 
❤️❤️ प्रणाम व आभार।


यह निर्मल सरिता जो बह रही है,
कुछ तो है जो यह मुझसे कह रही है।
फुर्सत इसे समझने की आज मिली है,
मुझ तुच्छ मनुष्य की यही तो संगदिली है।

पहली बात - 
कभी यह शोर मचाती है ,
कितनी ताकत है इसमें दर्शाती है।
उस पल इसे देखना, ए दोस्त!
अपनी रजतसदृश चमक से 
सूरज को भी पछाड़ जाती है।
तब यह हुंकार भरती है,
चुनौतियों से प्यार करती है।
उस पल मानो राह की शिला भी
पसीना पसीना हो इससे डरती है।
माँ समतुल्य सरिता मुझको सिखा रही थी,
डरना नहीं मेरे लाल, चुनौती की किसी शिला से
मैं जो चुल्लू में नहीं समा सकती
मुझे भी बिना टकराए कभी रास्ता नहीं मिला रे...
कभी रास्ता नहीं मिला रे....

दूसरी बात - 
अब कहीं यह खामोश रहती है
यूं लगता है कि कितनी सरलता से बहती है।
पर उस हर पल में भी 
कुछ तो है जो यह सहती है,
पर मेरे मित्रों! वो यूहीं चुपचाप नहीं रहती है।
तुम समझ न सके पर वो - 
कभी हंसती , कभी रोती है।
कभी वो दिन रात जगती है,
कभी थककर वो भी सोती है।
क्यों! अरे मेरे दोस्त! वो भी तो माँ होती है।
वो कितनों को जीवन दे चुकी है,
कितनों को दे रही है।
तू मनुष्य उसका लाल
तेरा दिया हर जख्म रह रही है।
तू उसे जहर पिलाता है, 
वो तुझे अमृत पिलाती है।
उसके अस्तित्व को ताक में रखने वाले
हर मनुष्य का जीवन वो सुलभ बनाती है।
वो बिना अवकाश की सेवा में
क्या ही कुछ कमाती है।
फिर भी वो माँ है सब चुपचाप सहती है,
कभी किसी घाटी में जाकर देखना
उसकी चीत्कार सुनाई देगी।
एक माँ की अपने बेटे से की पुकार सुनाई देगी,
वो कहती है - 
तू पूजना मत मुझे, बस सम्मान दे देना।
तू गुलाब न देना मुझे, बस अपशिष्ट न देना।
और...
और जितनी दफा मिलना हो,
बस प्रणाम कर माँ कह देना...
बस प्रणाम कर माँ कह देना...

पहली बात छोटी सी है, दूसरी बहुत बड़ी है।
दिल से सोचो, क्या! माँ ऐसी नहीं होती। ❤️❤️

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