हर कोई खड़ा है भीड़ में, फिर भी अकेला आप है। किसी के खुश या दुखी होने का होता नहीं कोई नाप है। कितने ग्राम का दुख कितनी खुशी को मिटा सकता है। कितने ग्राम का सुख कितने गम को भुला सकता है। फिर बहुत गम या बहुत खुशी इसकी बात ही कहां से आती है? क्या भूख की तपड़ प्राणी दर प्राणी बदल जाती है? क्या कड़ाके की ठंड में छत का न होना, व्यंग की बात हो सकती है? क्या बिना सूरज के दिन और बिना चांद के रात हो सकती है? जब कागज़ के फूलों से असली फूलों-सी खुशबू नहीं आती। जब ग्रहण के बाद भी अगले दिन चांद सूरज की लाली नहीं जाती। जब मिठाई की मिठास भी जुबान की कड़वाहट मिटा नहीं पाती। जब वृद्धाश्रम में बैठे मां बाप से भी बेटे के लिए आह तक निकाली नहीं जाती। पैसा हो तो बिरयानी की भूख भी जानलेवा हो सकती है। न हो पैसा तो दवा की भूख भी जिंदगी की चोरी हो सकती है। इस देश में सुख दुख करुणा की कल्पना करना भी एक शूल है। क्योंकि इन्हें परिभाषित करना आपकी हमारी नादान-सी एक भूल है। कोई नहीं समझ सकता कि कभी खुशी तो कभी गम किसी की मजबूरी होती है। सच तो यह है कि खुशी और गम बस गुलाबी नोटों से उस शख्स की दूरी होती है.....