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Showing posts from November, 2024

यही एक कसौटी जरूरी होती है...

हर कोई खड़ा है भीड़ में, फिर भी अकेला आप है। किसी के खुश या दुखी होने का होता नहीं कोई नाप है। कितने ग्राम का दुख कितनी खुशी को मिटा सकता है। कितने ग्राम का सुख कितने गम को भुला सकता है। फिर बहुत गम या बहुत खुशी इसकी बात ही कहां से आती है? क्या भूख की तपड़  प्राणी दर प्राणी बदल जाती है? क्या कड़ाके की ठंड में छत का न होना, व्यंग की बात हो सकती है? क्या बिना सूरज के दिन और बिना चांद के रात हो सकती है? जब कागज़ के फूलों से असली फूलों-सी खुशबू नहीं आती। जब ग्रहण के बाद भी अगले दिन चांद सूरज की लाली नहीं जाती। जब मिठाई की मिठास भी जुबान की कड़वाहट मिटा नहीं पाती। जब वृद्धाश्रम में बैठे मां बाप से भी बेटे के लिए आह तक निकाली नहीं जाती। पैसा हो तो बिरयानी की भूख भी  जानलेवा हो सकती है। न हो पैसा तो दवा की भूख भी जिंदगी की चोरी हो सकती है। इस देश में सुख दुख करुणा की कल्पना करना भी एक शूल है। क्योंकि इन्हें परिभाषित करना आपकी हमारी नादान-सी एक भूल है। कोई नहीं समझ सकता कि कभी खुशी तो कभी गम किसी की मजबूरी होती है। सच तो यह है कि खुशी और गम बस गुलाबी नोटों से उस शख्स की दूरी होती है.....

मुझे किसी से कोई गिला नहीं है...

कुछ आदत यूं पड़ी बोलने की, कि चुप रहना भी मुश्किल बड़ा है। क्योंकि सुनने वाला कोई नहीं है, इसलिए चुप रहना भी पड़ा है। मुश्किल यह है कि जिस तरह सब चाहते हैं, बस उस तरह बोलना है। सुनने वाले की मर्जी है जब, तब मुंह खोलना है। मेरी मर्जी तो जैसे मैं भूल ही गई हूँ, हर बात को मुझे सौ बार तोलना है। तोलकर बोलने से मुझे वो किसी बंदिश सी लगती है, जिसकी बेड़ी को मुझे दूसरे की चाबी से खोलना है। इस जद्दोजहद में मेरा गला रूंध सा गया है, नज़र कुछ धुंधली सी हो गई है। शोर तो मुझे भी सुनाई दे रहा है, पर मेरी आवाज़ जैसे कहीं खो गई है। मेरे कानों में जो आवाजें बस गई हैं, मैं उन्हें पहचानती नहीं हूं। मेरी तो शायद सिसकियां है, उसे आवाज़ मैं मानती नहीं हूं। अब इजाज़त देदो मुझे भी बोलने की, पर माफ़ी देदो तोलने की मुझमें कला नहीं है। न बोलने पर भी बन गई हूं मैं गुनहगार न जाने कितनों की पर शुक्र है मुझे किसी से कोई गिला नहीं है.... मुझे किसी से कोई गिला नहीं है....

कोई बता दो।

कुछ पल बिता लूं जो अपने संग कुछ पल जी लूं जो अपने रंग, कुछ पल की जीत लूंगी मैं जंग, बाकी पलों का होगा क्या ढंग। कोई बता दो। कुछ पल सज लूंगी मैं, कुछ पल असज रह लूंगी मैं, कुछ पल मैं बन जाऊंगी मैं  बाकी पल कौन होंगी मैं? कोई बता दो। कुछ पल हसूंगी, कुछ पल चुप रहूंगी। कुछ पल खामोश होकर भी कुछ कहूंगी, बाकी पल बोलकर खामोश कैसे रहूंगी? कोई बता दो। कुछ अपना सा यहां दिखता नहीं है, कुछ बेगाना है यह भी पता नहीं है। कुछ पल को भी कोई पल टिकता नहीं है, बाकी पल कैसे खरीदूं कोई पल बिकता नहीं है? कोई तो बता दो। कोई तो बता दो