कुछ आदत यूं पड़ी बोलने की,
कि चुप रहना भी मुश्किल बड़ा है।
क्योंकि सुनने वाला कोई नहीं है,
इसलिए चुप रहना भी पड़ा है।
मुश्किल यह है कि जिस तरह सब चाहते हैं,
बस उस तरह बोलना है।
सुनने वाले की मर्जी है जब,
तब मुंह खोलना है।
मेरी मर्जी तो जैसे मैं भूल ही गई हूँ,
हर बात को मुझे सौ बार तोलना है।
तोलकर बोलने से मुझे वो किसी बंदिश सी लगती है,
जिसकी बेड़ी को मुझे दूसरे की चाबी से खोलना है।
इस जद्दोजहद में मेरा गला रूंध सा गया है,
नज़र कुछ धुंधली सी हो गई है।
शोर तो मुझे भी सुनाई दे रहा है,
पर मेरी आवाज़ जैसे कहीं खो गई है।
मेरे कानों में जो आवाजें बस गई हैं,
मैं उन्हें पहचानती नहीं हूं।
मेरी तो शायद सिसकियां है,
उसे आवाज़ मैं मानती नहीं हूं।
अब इजाज़त देदो मुझे भी बोलने की,
पर माफ़ी देदो तोलने की मुझमें कला नहीं है।
न बोलने पर भी बन गई हूं मैं गुनहगार न जाने कितनों की
पर शुक्र है मुझे किसी से कोई गिला नहीं है....
मुझे किसी से कोई गिला नहीं है....
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