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Showing posts from June, 2025

मौन का इंतजार

खुश रहने की वजह ढूंढती हूँ , दिल में उसे रखने की जगह ढूंढती हूँ। बहुत कुछ भरा है इस दिल में, वो क्यों है यहां इसकी भी वजह ढूंढती हूँ। जाने कितने दर्द हैं इसमें, न जाने कितना डर है। मुझे मालूम भी नहीं मेरा दिल, कितने जख्मों का घर है। काश किस्मत की जगह  दिल बनाना मेरे हाथ में होता। तो शायद यह मेरा दिल इस कदर ज़ख्मी न होता। मुझे ठगने में किस्मत ने भी कभी कमी नहीं की। आसमां दिया इतना विशाल, पर विश्राम को ज़मी नहीं दी। अब इनसे शिकायत भी करनी नहीं मुझे क्योंकि यह शिकायतें मुझे ही ज़ख्मी बनाती हैं। मेरे अपनों के कानों व दिल की पथरीली दीवार से टकराकर, मेरे ही दिल को छलनी कर जाती है। अब मुझे न तो डरना है, न कुछ करना है न जीना है और न डरकर मारना है। बस इस दिल को उसके हाल पर छोड़, विधाता के लिखे मेरे मौन का इंतजार करना है... विधाता के लिखे मेरे मौन का इंतजार करना है...

गर्मी में टिप-टॉप?

मुझे नहीं पता गर्मी में हर वक्त कैसे टिप-टॉप रहा जाता है। झूठ नहीं कहूंगी मुझे तो बहुत पसीना आता है। सब्जी बनाने में तो बीच-बीच में पसीना सुखा लेती हूं, पर रोटी बनाने में मेरा दम निकल जाता है। मुझे पता नहीं इस गर्मी में हर वक्त कैसे टिप-टॉप रहा जाता है। माना पाउडर थोड़ी देर को ठंडी सी जलन देता है, माना कूलर ए.सी. कमरे को स्वर्ग बना देता है। पर मैं पहले गृहिणी ही थी अब कामकाजी भी हूं, कूलर ए.सी. मेरे कदमों से कदम मिलाकर चल नहीं पाता है। मुझे पता नहीं इस गर्मी में हर वक्त कैसे टिप-टॉप रहा जाता है। सिर धोया है या पसीने से भीगा है, इन घने मुलायम केशों को भी समझ नहीं आता है। पल भर को शरबत की ठंडाई से मिलती है ठंडक, पर दो पल के बाद गला फिर से मरुस्थल सा बन जाता है। मुझे पता नहीं इस गर्मी में हर वक्त कैसे टिप-टॉप रहा जाता है। आजकल धूप में सुखाएं कपड़े जिस तरह पल भर में सूख जाते है, उसी तरह पहना हुआ कपड़ा भी पलभर में भीगकर गिज़गिजाट पाड़ जाता है। स्टाइल में अंग्रेजी कैसे बोलूं, हिंदी में भी पहाड़ी घुस आई है, कोई कहेगा कैसी महिला है, हिंदी लिखना पढ़ना भी नहीं आता है। मुझे पता नहीं इस गर्मी में हर...