खुश रहने की वजह ढूंढती हूँ ,
दिल में उसे रखने की जगह ढूंढती हूँ।
बहुत कुछ भरा है इस दिल में,
वो क्यों है यहां इसकी भी वजह ढूंढती हूँ।
जाने कितने दर्द हैं इसमें,
न जाने कितना डर है।
मुझे मालूम भी नहीं मेरा दिल,
कितने जख्मों का घर है।
काश किस्मत की जगह
दिल बनाना मेरे हाथ में होता।
तो शायद यह मेरा दिल
इस कदर ज़ख्मी न होता।
मुझे ठगने में किस्मत ने भी
कभी कमी नहीं की।
आसमां दिया इतना विशाल,
पर विश्राम को ज़मी नहीं दी।
अब इनसे शिकायत भी करनी नहीं मुझे
क्योंकि यह शिकायतें मुझे ही ज़ख्मी बनाती हैं।
मेरे अपनों के कानों व दिल की पथरीली दीवार से टकराकर,
मेरे ही दिल को छलनी कर जाती है।
अब मुझे न तो डरना है, न कुछ करना है
न जीना है और न डरकर मारना है।
बस इस दिल को उसके हाल पर छोड़,
विधाता के लिखे मेरे मौन का इंतजार करना है...
विधाता के लिखे मेरे मौन का इंतजार करना है...
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