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बस वक्त बीता है!

छूट गई जिंदगी, जिंदगी की खोज में,

खोके जिंदगी मैं आज आई हूँ होश में।

बड़ी मुद्दत से उसको चाहूंगी सोचा था,

खुद की ख्वाहिश ही भूल गई मैं जोश-जोश में।

कभी अभाव की नमी थी आँखों में,

आज आँखों में सुकून की कमी है।

कौन कहता है मुझे पूरी दुनिया देखनी है,

मेरे लिए तो पूरी दुनिया मेरे घर की ही जमीं है।

मेरे बच्चों ने जो इस घर में तूफान लाया है,

मुझे उसमें भी समंदर-सा मज़ा आया है।

उनकी किलकारियों को महसूस किया तो लगा,

मेरा खोया हुआ बचपन लौट आया है।

जो कहता है यह सब मोह माया है- उससे पूछती हूँ,

जब प्रीत नहीं हृदय में तो मानव-जीवन ही क्यों पाया है?

क्यों पाषाण-सा बनाकर तुझे भेजा नहीं उसने,

जो पाषाण को मानव में बदलने इस ज़मीं पर स्वयं आया है?

बदलते वक्त में भाव जरूर बदले हैं,

पर हृदय का धड़कना कहां बदल पाया है?

वक्त बदला है, वक्त के साथ बदलने के लिए,

पर चौबीस घंटों की सीमा कौन बदल पाया है?

कभी लगा पैसों से चलती है जिंदगी,

तो कभी लगा पैसों ने जिंदगी को मिटाया है?

अब उलझन में हूँ मैं कि मैंने जिंदगी में पैसों को खाया है,

या इन पैसों ने मेरी जिंदगी को खाया है?

जिंदगी की हर रोज की जंग में,

मुश्किल है समझना कि कौन हारा, कौन जीता है?

खोल जिंदगी के उम्रभर के बहीखाते को देखा तो 

समझ आया कि कुछ नहीं हुआ यहाँ -

न कोई हारा, न कोई जीता है,

सच तो यह है कि यहाँ - बस वक्त बीता है, बस वक्त बीता है...





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