उस दिन उस एक मय्यत पर हमने
एक अपने को नहीं अपने पूरे परिवार को खोया था।
जिसको सोचकर सोचकर ही
दिल, आत्मा, मेरा वजूद तक रोया था।
मैं दौड़ा था उसको कुछ पल थामने के लिए,
अपनी यादों में उसकी झलक बांधने के लिए।
उसकी ठंडी पड़ी उंगलियों को अपने कलेजे पर रखना चाहा था,
उसके जाने के गम की जलन कुछ-कुछ मिटाने के लिए।
पर कदम पड़े जब उस चौखट पर तो,
वहां उसका नामोनिशान तक न था।
खामोश धरती थी, खामोश आसमान था,
पर उस गली, उस शहर में उसका कोई सामान तक न था।
मैं पहुंचा, मैंने पूछा कहां गया वो,
जिससे मिलने मैं दौड़-दौड़कर आया हूँ?
कुछ नहीं बस अपनी यादें,
अपने गम, अपनी नम पलकें मैं लाया हूँ।
वो सुनसान सा आंगन,
उसमें बस ब्रूनो का भौंकना,
हर होती आहट पर बस
एक उस कुत्ते का चौंकना।
बस एक उसकी आँखों में मुझे
किसी के आने की आस दिखती थी,
बस एक उसकी आँखों में मुझे
अपने मालिक को पाने की प्यास दिखती थी।
बाकी तो हर कोई बस बात बता रहा था,
वो राज था या हकीकत कुछ समझ कहां आ रहा था।
मैं बस एक तस्वीर बनाता रहा अपने जेहन में,
कोई उसे हार्ट अटैक तो कोई जहर बता रहा था।
कोई नील कह रहा था, कोई सेहत की ढील कह रहा था,
कोई तकदीर कह रहा था, कोई गहरी पीड़ कह रहा था
मैं उलझन में था कि उसने कभी कुछ क्यों नहीं कहा था?
जब उसका दिल कोई तकलीफ सह रहा था।
मैं टूटे दिल, बिखरे दिमाग को कुछ समझा नहीं पा रहा था,
पूछने पे कैसे गया वो, अजीब अजीब सा जवाब आ रहा था।
कोई कहता कि माँ को कुछ कहा तो बेटा सबको जेल भिजवा देगा,
पिता के जाने का दोषी, पूछने वाले को बना देगा।
खबरदार कोई खबर लेने की कोशिश न करना,
वरना गुनाह की पूछ करने वाले को वो गुनहगार बना देगा।
कोई कुछ बक रहा था, तो कोई कुछ बक रहा था,
पर सच बताने वाला कोई वहाँ कहाँ था?
अपनों की भीड़ में वो खोया था या हम
हमें समझने वाला या समझाने वाला एक जहाँ चला गया था।
वहाँ जो भी था उनकी बातें एक दूजे से इत्तेफाक नहीं रखती थीं,
कोई कुछ कहता तो उसकी निगाह कुछ और ही कहती थी...
मुझे कुछ समझ नहीं आया सच क्या रहा होगा,
दिमाग तो कुछ सोच न पाया पर दिल की हर आँख बहती थी...
पर दिल की हर आँख बहती थी...
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