Skip to main content

अनसुनी पीर


लिखूँ या न लिखूँ
तुम कहाँ पढ़ोगे?

दर्द है, यह सच है
तुम कहाँ देखोगे?

जो खुद नहीं देखा
उसे किसी तीसरे से क्या कहोगे?

आह की आवाज़ होती तो सुनते,
दिल की पीर तुम कहाँ सुनोगे?

और जब तक तुम
पढ़ोगे, देखोगे, बोलोगे, सुनोगे—

तब तुम
उसे इस धरा पर न पाओगे।



Comments

Popular posts from this blog

हिंदी की पीड़ा

साल भर बाद आज,  निकलकर वो बाहर आई। मैंने कहा बहन तुमको हिंदी दिवस की बहुत बधाई। और पूरे जोश से पूछा - "कैसी हो हिंदी?" अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन आदि वायरस के बीच, मुझे लगा तुम नहीं बची, पर हर्ष हुआ, तुम तो हो आज भी जिंदी! उसने जो कहा, उसे सुन दिल टूट गया, ऐसा लगा जैसे अपना कोई हो छूट गया। उसका दर्द बड़ा ही गहरा था, उसको गैरों ने नहीं ठगा था, कोई अपना ही था उसे जो लूट गया। उसने कहा- "कैसे कहूं! कैसी है यह हिंदी!" जो थी कभी मां के माथे की बिंदी-सी, अब है थोड़़ी मृत, थोड़ी जिंदी-सी। थोड़ी इंग्लिश हुई, थोड़ी हिंग्लिश हुई, बस थोड़ी ही बची वो हिंदी-सी। बस यह कह वो खामोश हुई, और मुझसे बहुत कुछ कह-सी गई। उसके अलविदा में कोई खुशी न थी, वो गई वहां से पर, कुछ वहीं पर रह-सी गई।  वो सबके लिए एक भाषा है, पर उसको भी हमसे आशा है। सांस उसे कुछ कम-सी हैं, मृत होती वो, उसको बहुत निराशा है। पहले वो बोली, माँ की बोली थी। पूजनीय थी वो जैसे, पूजा के थाल में रोली थी, वो दिए-सी जलती दिवाली थी, वो रंगों से भरी होली-सी थी। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट, और न जाने कितने झूलों में खेली ...

माँ सरिता (नदी)

आज गुरुजनों के सानिध्य में बिताए कुछ पलों में ऐसी शांति मिली कि बहुत दिनों बाद जीवन को समझने को कुछ पल मिल गए। गुरु छाया मुझ पर सदैव बनी रहे।  ❤️❤️ प्रणाम व आभार। यह निर्मल सरिता जो बह रही है, कुछ तो है जो यह मुझसे कह रही है। फुर्सत इसे समझने की आज मिली है, मुझ तुच्छ मनुष्य की यही तो संगदिली है। पहली बात -  कभी यह शोर मचाती है , कितनी ताकत है इसमें दर्शाती है। उस पल इसे देखना, ए दोस्त! अपनी रजतसदृश चमक से  सूरज को भी पछाड़ जाती है। तब यह हुंकार भरती है, चुनौतियों से प्यार करती है। उस पल मानो राह की शिला भी पसीना पसीना हो इससे डरती है। माँ समतुल्य सरिता मुझको सिखा रही थी, डरना नहीं मेरे लाल, चुनौती की किसी शिला से मैं जो चुल्लू में नहीं समा सकती मुझे भी बिना टकराए कभी रास्ता नहीं मिला रे... कभी रास्ता नहीं मिला रे.... दूसरी बात -  अब कहीं यह खामोश रहती है यूं लगता है कि कितनी सरलता से बहती है। पर उस हर पल में भी  कुछ तो है जो यह सहती है, पर मेरे मित्रों! वो यूहीं चुपचाप नहीं रहती है। तुम समझ न सके पर वो -  कभी हंसती , कभी रोती है। कभी वो दिन रात जगती है, कभी...

परम सखी!

जहां एक पल नहीं कट रहा वहाँ तीन साल बिताना मुमकिन नहीं लग रहा। मैं मुस्कुराती तो हूँ पर बस दर्द छुपाती हूँ, इस तरह यह दर्द भी नहीं बँट रहा। कोई किसी जादूगर को बुला दो, मुझे मेरी पहचान भुला दो। या मुझे किसी ख्वाब में ले जाकर  मेरी रूह को ही सुला दो। मेरे दर्द को मेरी  रूह भी भांप चुकी है, इसकी सिहरन से मेरी साँसें भी काँप चुकी हैं। अब जीवन जीवन नहीं रहा, न खुशी खुशी रह गई है। आई थी आज फिर अश्कों की टोली, जो मुझे उनकी परम सखी कह गई है... जो मुझे उनकी परम सखी कह गई है...