Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2026

जिंदगी के दस्ताने

कितना संभालना चाहते हैं  इस जिंदगी को  पर यह जिंदगी है  संभलती नहीं है। एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा लिया, पर यह किस्मत है बदलती नहीं। जाने क्यों सर्दियों-सी बैठी यह ज़िंदगी ठिठुरती रहती है, और गर्मियों की तपिश-सी बातें सुन अक्सर झुलसती रहती है। काश कभी पड़ जाती इस पर भी नरम ओस की बूँद, नरम-सी बारिश की छुवन— और मैं भी कुछ पल को अपनी पलकों को मूँद लेती। जैसे हाथ रहते हैं सुरक्षित दस्तानों के भीतर, वैसे ही मैंने भी ज़िंदगी के लिए दस्ताने सी लिए। अब फुर्सत मिली है उन्हें दिखाने की, कड़ी धूप और कड़ी ठंड से ज़िंदगी को बचाने की। बड़ी मुश्किल से सिए हैं इन्हें, अब खो न पाऊँगी। फट भी गए तो बार-बार सीती जाऊँगी। क्योंकि शायद कुछ ज़्यादा ही मोटे हैं जो हमने पहने हैं— ये ज़िंदगी के दस्ताने। ज़िंदगी के दस्ताने।

अनसुनी पीर

लिखूँ या न लिखूँ तुम कहाँ पढ़ोगे? दर्द है, यह सच है तुम कहाँ देखोगे? जो खुद नहीं देखा उसे किसी तीसरे से क्या कहोगे? आह की आवाज़ होती तो सुनते, दिल की पीर तुम कहाँ सुनोगे? और जब तक तुम पढ़ोगे, देखोगे, बोलोगे, सुनोगे— तब तुम उसे इस धरा पर न पाओगे।

कोई शुभकामना कुबूल न होगी...

नारी तुम तो नारी हो, न अबला न बेचारी हो। लक्ष्मी हो तुम, तुम ही विद्या हो, तुम ही नवदुर्गा शक्ति स्वरूपा हो। जिंदगी का आरंभ तुमसे, जिंदगी का अंत तुम हो। इक मकान का मालिक होता है पुरुष पर, उसको घर बनाने का मंत्र, नारी तुम हो। तुम न अपनों से हारी हो, न तुम अपने सपनों की मारी हो। तुम हर काम की शुरुआत हो  और तुम हर जंग की तैयारी हो। नारी तुम तो नारी हो। ये जो बोला सब सच है क्या, क्या इसमें रत्तीभर का भी झूठ नहीं? सच बताओ तुम सर्वेसर्वा हो इस जग की या इस तेरे जग में, तेरे घर में तेरी कोई पूछ नहीं। एक बार मनन करके देखो, जैसा कहती हूँ वैसा करके देखो - एक बार सुंदर-सुकुमल बनना, तुम देखना, तुम तब भी कुचली जाओगी। फिर सबल सुदृढ़ बनकर देखना, तुम तब भी ताने पाओगी। साल भर रोने वाली तू नारी तुम कुछ नहीं बस भोली हो! तुम्हें हर मज़ाक में सिरदर्द कहने वालों की तुम हर मर्ज की गोली हो। तुम घर की लाज शर्म हया हो, तो कभी दिल बहलाने वाली अदा हो। कभी सात फेरों की वफ़ा हो, तो कभी घर बचाने वाली सदा हो। तुम जिम्मेदारी उठाने वाला कांधा हो, तुम बॉस की फटकार निकालने का जरिया हो। तुम कभी उसकी गलतियों का पुतला हो...

पर दिल की हर आँख बहती थी...

उस दिन उस एक मय्यत पर हमने  एक अपने को नहीं अपने पूरे परिवार को खोया था। जिसको सोचकर सोचकर ही दिल, आत्मा, मेरा वजूद तक रोया था। मैं दौड़ा था उसको कुछ पल थामने के लिए, अपनी यादों में उसकी झलक बांधने के लिए। उसकी ठंडी पड़ी उंगलियों को अपने कलेजे पर रखना चाहा था, उसके जाने के गम की जलन कुछ-कुछ मिटाने के लिए। पर कदम पड़े जब उस चौखट पर तो, वहां उसका नामोनिशान तक न था। खामोश धरती थी, खामोश आसमान था, पर उस गली, उस शहर में उसका कोई सामान तक न था। मैं पहुंचा, मैंने पूछा कहां गया वो, जिससे मिलने मैं दौड़-दौड़कर आया हूँ? कुछ नहीं बस अपनी यादें, अपने गम, अपनी नम पलकें मैं लाया हूँ। वो सुनसान सा आंगन,  उसमें बस ब्रूनो का भौंकना, हर होती आहट पर बस  एक उस कुत्ते का चौंकना। बस एक उसकी आँखों में मुझे किसी के आने की आस दिखती थी, बस एक उसकी आँखों में मुझे  अपने मालिक को पाने की प्यास दिखती थी। बाकी तो हर कोई बस बात बता रहा था, वो राज था या हकीकत कुछ समझ कहां आ रहा था। मैं बस एक तस्वीर बनाता रहा अपने जेहन में, कोई उसे हार्ट अटैक तो कोई जहर बता रहा था। कोई नील कह रहा था, कोई सेहत की ढील ...