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वक्त का वक्त

जब वक्त नहीं रुकता कभी,

फिर वो मुझे क्यों रोकता है?

खुद नहीं हटता पीछे, 

तो मुझे क्यों अतीत में झोंकता है?

मैं नहीं टोक सकती उसे मुझे पता है,

फिर क्यों हर कदम पर वो मुझे टोकता है?

अधर में फंँसाकर मेरी जिंदगी को

वो क्यों मुस्कुराता हंँसता है?

कोई पूछे न पूछे उससे 

मेरे साथ उसके इस अन्याय को करने की वजह

जो जख्मी है, वो मेरा हृदय है,

वो उससे यह प्रश्न पूछता है-

मैंने कब कहा था मुझे हर पल मुस्कुराना है?

मैंने कब कहा था मुझे हर खुशी को पाना है?

मैंने कब कहा था मुझे रहने को महल बनाना है?

मैंने कब कहा था मुझे हर ख्वाब को अपना बनाना है?

और जो कहती हूँ वो कोई सुनता कहाँ है,

मेरे अपनों का सुकून मेरा मुस्कुराना है,

झूमना उनका खुशी में मेरा खुशी को पाना है।

जहाँ हों मेरे अपने उस झोपड़ी को महल मानती हूँ,

उनकी पलकों के हर ख्वाब को ही मैंने अपना बनाना है।

मैं सब जानती हूँ, तू भी तो जलन में जलता है,

तू भी नहीं देता किसी को सबकुछ क्योंकि

तुझे ही कब कहाँ सब-कुछ मिलता है?

तुझे अपशब्द कहने वालों की कमी नहीं है,

तेरा गुणगान करने वाले तेरा साथ छोड़ देते है

कहते हैं तू गिरगिट से भी जल्दी रंग बदलता है।

तू साथ हो तो तेरे साथ होते हैं तेरी चमचागिरी करने वाले,

तेरी तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले,

तेरी ताकत, तेरी हर हुंकार से डरने वाले।

इक बार फेरकर मुँह तू देखना,

सच्चाई पता जल जाएगी।

वक्त को, वक्त पर, वक्त की पहचान नई मिल जाएगी,

तू न कल किसी का सगा था,

न कल को हो पाएगा।

मुझे मालूम है मेरा वक्त नहीं आया है अभी,

न इतनी आसानी से आ पाएगा। 

पर ए वक्त! तू भी न इतरा इतना

तेरा वक्त भी न कल आया था...

और न कभी कल आ पाएगा...

और न कभी कल आ पाएगा...



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