Skip to main content

जय भारती

मेरे देश की मैं क्या तारीफ करूं
यहां नदियां देवी सी बहती हैं।
यहां जन्मे कई भगत सिंह और कलाम,
और गली गली में लक्ष्मी नीरजा रहती हैं।
मेरे देश की मैं क्या तारीफ करूं
यह पूरी दुनिया का संगम है।
मेरी मां पर आंख उठा दे कोई
किसमें कहां ऐसा दम है।
मेरे देश की मैं क्या तारीफ करूं
है राधा-कृष्ण का प्यार यहां।
यह अमन प्रेम की नगरी है, 
है कुटिल मन का संहार यहां।
इस माटी की हवा भी 
हमें पल-पल याद दिलाती है।
यह सांगा प्रताप की भूमि है,
यह भय से नहीं, रक्त से पूजी जाती है।

तीन रंग का हमारा तिरंगा 
हमारे जज्बातों की कहानी है ।
यह यूं तो शीतल जल की धारा है,
यह यूं तो ममता का आंचल सारा है,
यह यूं तो धर्मों का आलिंगन है,
यह यूं तो बुद्धि मतों का चिंतन है। 
पर वक्त पड़े तो, पर वक्त पड़े तो 
यह वीरों की रवानी है। 
जो देश प्रेम पर मर मिट जाए 
ऐसी इस देश की जवानी है।

मैं भी हाड़ मांस का पुतला हूं
पर मुझे सियाचीन न गला पाया।
सब पैंतीस डिग्री से डरते हैं 
पर मुझे बाड़मेर भी न जला पाया।  
धन्य हूं मैं मैंने ऐसे देश में जन्म पाया,
इसका प्यार मेरी रगों में लहू बनकर बहता है।
जब भी बहेगा यह कतरा बनकर, 
तुम कान लगा कर सुन लेना यह
जय भारती जय भारती ही कहता है। 
जय भारती जय भारती ही कहता है।

Comments

Popular posts from this blog

हिंदी की पीड़ा

साल भर बाद आज,  निकलकर वो बाहर आई। मैंने कहा बहन तुमको हिंदी दिवस की बहुत बधाई। और पूरे जोश से पूछा - "कैसी हो हिंदी?" अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन आदि वायरस के बीच, मुझे लगा तुम नहीं बची, पर हर्ष हुआ, तुम तो हो आज भी जिंदी! उसने जो कहा, उसे सुन दिल टूट गया, ऐसा लगा जैसे अपना कोई हो छूट गया। उसका दर्द बड़ा ही गहरा था, उसको गैरों ने नहीं ठगा था, कोई अपना ही था उसे जो लूट गया। उसने कहा- "कैसे कहूं! कैसी है यह हिंदी!" जो थी कभी मां के माथे की बिंदी-सी, अब है थोड़़ी मृत, थोड़ी जिंदी-सी। थोड़ी इंग्लिश हुई, थोड़ी हिंग्लिश हुई, बस थोड़ी ही बची वो हिंदी-सी। बस यह कह वो खामोश हुई, और मुझसे बहुत कुछ कह-सी गई। उसके अलविदा में कोई खुशी न थी, वो गई वहां से पर, कुछ वहीं पर रह-सी गई।  वो सबके लिए एक भाषा है, पर उसको भी हमसे आशा है। सांस उसे कुछ कम-सी हैं, मृत होती वो, उसको बहुत निराशा है। पहले वो बोली, माँ की बोली थी। पूजनीय थी वो जैसे, पूजा के थाल में रोली थी, वो दिए-सी जलती दिवाली थी, वो रंगों से भरी होली-सी थी। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट, और न जाने कितने झूलों में खेली ...

माँ सरिता (नदी)

आज गुरुजनों के सानिध्य में बिताए कुछ पलों में ऐसी शांति मिली कि बहुत दिनों बाद जीवन को समझने को कुछ पल मिल गए। गुरु छाया मुझ पर सदैव बनी रहे।  ❤️❤️ प्रणाम व आभार। यह निर्मल सरिता जो बह रही है, कुछ तो है जो यह मुझसे कह रही है। फुर्सत इसे समझने की आज मिली है, मुझ तुच्छ मनुष्य की यही तो संगदिली है। पहली बात -  कभी यह शोर मचाती है , कितनी ताकत है इसमें दर्शाती है। उस पल इसे देखना, ए दोस्त! अपनी रजतसदृश चमक से  सूरज को भी पछाड़ जाती है। तब यह हुंकार भरती है, चुनौतियों से प्यार करती है। उस पल मानो राह की शिला भी पसीना पसीना हो इससे डरती है। माँ समतुल्य सरिता मुझको सिखा रही थी, डरना नहीं मेरे लाल, चुनौती की किसी शिला से मैं जो चुल्लू में नहीं समा सकती मुझे भी बिना टकराए कभी रास्ता नहीं मिला रे... कभी रास्ता नहीं मिला रे.... दूसरी बात -  अब कहीं यह खामोश रहती है यूं लगता है कि कितनी सरलता से बहती है। पर उस हर पल में भी  कुछ तो है जो यह सहती है, पर मेरे मित्रों! वो यूहीं चुपचाप नहीं रहती है। तुम समझ न सके पर वो -  कभी हंसती , कभी रोती है। कभी वो दिन रात जगती है, कभी...

कोई शुभकामना कुबूल न होगी...

नारी तुम तो नारी हो, न अबला न बेचारी हो। लक्ष्मी हो तुम, तुम ही विद्या हो, तुम ही नवदुर्गा शक्ति स्वरूपा हो। जिंदगी का आरंभ तुमसे, जिंदगी का अंत तुम हो। इक मकान का मालिक होता है पुरुष पर, उसको घर बनाने का मंत्र, नारी तुम हो। तुम न अपनों से हारी हो, न तुम अपने सपनों की मारी हो। तुम हर काम की शुरुआत हो  और तुम हर जंग की तैयारी हो। नारी तुम तो नारी हो। ये जो बोला सब सच है क्या, क्या इसमें रत्तीभर का भी झूठ नहीं? सच बताओ तुम सर्वेसर्वा हो इस जग की या इस तेरे जग में, तेरे घर में तेरी कोई पूछ नहीं। एक बार मनन करके देखो, जैसा कहती हूँ वैसा करके देखो - एक बार सुंदर-सुकुमल बनना, तुम देखना, तुम तब भी कुचली जाओगी। फिर सबल सुदृढ़ बनकर देखना, तुम तब भी ताने पाओगी। साल भर रोने वाली तू नारी तुम कुछ नहीं बस भोली हो! तुम्हें हर मज़ाक में सिरदर्द कहने वालों की तुम हर मर्ज की गोली हो। तुम घर की लाज शर्म हया हो, तो कभी दिल बहलाने वाली अदा हो। कभी सात फेरों की वफ़ा हो, तो कभी घर बचाने वाली सदा हो। तुम जिम्मेदारी उठाने वाला कांधा हो, तुम बॉस की फटकार निकालने का जरिया हो। तुम कभी उसकी गलतियों का पुतला हो...