कभी भारतवर्ष की पहचान होने वाली मैं हिंदी,
अब यहां कुछ अनजानी-सी हो गई हूँ।
विदेशी भाषाओं के बढ़ते दखल से,
मैं भूसे के ढेर में सुई समान-सी खो गई हूँ।
अब खुद से मिलने, मुझे विदेशों में पड़ता है जाना,
वहां मौजूद है अब भी कहीं कहीं मेरा ठिकाना ।
यूँ तो मुझे बोलने वालों की संख्या भारत में ज़्यादा हैं,
पर मेरा अस्तित्व विदेशों में ही मान पाता है।
मेरे अपने घर में तो मुझे नालायक कम अक्ल आंका जाता है,
वहीं विदेशों में मुझे देशभक्ति का सूचक माना जाता है।
अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, रसियन, चाइनीज, जैपनीज के बाद,
यहाँ मेरी जन्मभूमि में मेरा नंबर आता है।
वर्ष भर की हीनता का शिकार मुझ हिंदी को,
सरकारी कागजों व सम्मेलनों में ही सम्मान मिल पाता है।
और विदेशों में! विदेशों में हिंदी भारत से जुड़े रहने का जरिया है,
हिंदी-हिंदी भाई-भाई पराए मुल्क में अपनत्व को दर्शाता है।
विदेश में अपनों की कमी का जख्म,
मात्र हिंदी रूपी भाषा के मरहम से ही भर जाता है।
कुछ कॉलोनियों व घरों में वहां हिंदी ही भजन का सूचक है
हिंदी का प्रयोग करते ही दिन त्योहार सा बन जाता है।
ओ! भारत के हिंदीभाषी! - दिल पर हाथ रखकर मेरे प्रश्नों का जवाब दे,
क्या यह प्रेम-भाव आज भारत में बोली जाने वाली हिंदी में उभर पाता है?
क्या सच में भारत में हिंदी बोलने मात्र से अपनत्व व भाईचारा बढ़ जाता है?
विदेशों में माँ-सी पूजी जाने वाली हिंदी को,
क्या भारत में हिंदी होने का मान भी मिल पाता है... क्या हिन्दी होने का मान मिल पाता है...
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