'खुश हूँ मैं या नहीं' मुझे समझ नहीं आता,
मुझे पता ही नहीं खुशी की क्या है परिभाषा?
कभी लगता है सब कुछ पाने में खुशी है,
कभी लगता है खुशी तब है जब सब है छूट जाता।
कभी चंद रंगीन कागज़ की चमक खुशी लगती है,
कभी देह पर इत्र की खुशबू खुशी लगती है।
कभी खुशी भूख में मिली सुखी रोटी सी दिखती है,
तो कभी लगता है खुशी रेडी, ठेलों व बाज़ारों में बिकती है।
कभी खुशी मलमल या नर्म सिल्क का टुकड़ा लगती है,
तो कभी खुशी उस अजनबी का मुझसे मिलता दुखड़ा लगती है।
चेहरे पर कुछ न लगाती हुई मेरे चेहरे की शक्ल मेरी खुशी है,
तो कभी नील को छिपाती उसकी क्रीम उसकी खुशी बन चमकती है।
मैं बच्चों की याद में तड़पती हुई,
रेत-सी चमकीली खुशी को खोती हुई,
अपनी जिंदगी में तन्हाई का बीज बोती हुई,
अपने फ़र्ज़ को अपने ग़म का मर्ज़ बनाती हूँ,
कई बच्चों को कामयाबी का मतलब हँसकर बताती हूँ।
मंजिल पाने के लिए घरों से दूरी करनी पड़ती है,
और घरों की आड़ में अपनों से दूरी बढ़ती है,
पर लक्ष्य पाने की आस मैं उनमें हर पल जागती हूँ,
कोई बताओ मुझे भी! क्या मैं उन्हें यह सब सही पढ़ाती हूँ।
मैं एक रोशनी को चंद्रमा समझ उसके पीछे चलती रही,
जिस तरफ से दिखी वो अपनी गली बदलती रही।
फिर पा लिया जब उसे तो पता चला आज अमावस है,
दरअसल चंद्रमा को पहचानने में मेरी ही गलती रही।
वो एक बल्ब की रोशनी थी,
जिसे मैंने पागलों की तरह चाहा था।
बड़ी जतन और मन्नत से जिसे पाया था,
अब समझ नहीं आ रहा कि क्या वो सच में मेरी खुशी थी?
हर मुस्कुराहट खुश हो जरूरी नहीं,
कभी लगता है मुस्कुराना मजबूरी नहीं।
पर बिना मुस्कुराहट लोग मुझे पहचान नहीं पाते हैं,
मुझे हर पल जताना पड़ता है कि खुशी की मेरे दिल से दूरी नहीं।
क्या कहूँ! अश्कों से आँख भीगी है या दिल भीगा है,
कौन है वो शख्स जिसने खुश रहने को जरूरी लिखा है।
ढूंढती थक गई मैं इस भीड़ में खुशी और किसी खुशनसीब को
सच तो यह है कि मुझे नहीं लगता कि
सच में किसी को पता है कि-
सच में खुशी क्या है? सच में खुशी क्या है?
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