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ऐ निराकारम्! निरंकार!

तू निराकार! पर तेरा रूप प्यारा है।

तू है या नहीं मेरे पास साक्ष्य नहीं,

पर मेरे जीवन का तू आधार सारा है।

कभी तन , कभी मन, 

कभी हृदय में पाती हूँ।

होता है अक्सर ऐसा

जब मैं तुझमें डूब जाती हूँ।

तेरी सृष्टि है यह सारी, या तू ही सृष्टि है,

यह सब जान पाने की कहाँ मेरी दृष्टि है।

पर जितना भी तुझे जानने की कोशिश मैं करती हूँ,

मालूम होता है तू प्रेम है, वात्सल्य है, स्नेह की वृष्टि है।

निराकार तू तेरा रंग क्या होगा?

तेरे चलने, मिलने, जुड़ने का ढंग क्या होगा?

तू न मिला तो वो जीवन ही क्या होगा?

बिन मिले तुझसे इस जीवन में सत्संग क्या होगा?

मेरी कल्पना की भी इतनी शक्ति नहीं,

इसमें तेरी वास्तविक छवि दिखती नहीं।

पलकों को बंद कर तुझे निहारना भी चाहूं तो

नैनों के जल में तेरी छवि टिकती नहीं।

काश! तू दिखता तो तुझे देख भी लेती,

पर तू बिना दिखे भी इतना न्यारा है।

कौन कहता है कि मेरे हाथ खाली हैं,

जो तू पास है तो मेरे पास संसार सारा है...



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