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बुआ की बदनसीबी

यूं तो हमने कोई अंतर नहीं,

हम दोनों ही बहने हैं।

पर एक कुछ कह भी नहीं सकती,

और दूजी के क्या कहने हैं।

शिकवा शिकायत करने की 

एक में ताकत नहीं।

और दूजी को शिकायत का 

कोई मौका मिलता ही नहीं।

उन दोनों में बस एक ही अंतर है,

एक भाई की बहन है और

दूजी भाई की साली और

उसकी बीवी की बहन है।

एक का रिश्ता दूसरे घर जाते ही,

भाई की नजरों में फीका पड़ जाता है।

और दूजी का बहन के पराए घर जाने पर भी

रुतबा पहले से और ज़्यादा बढ़ जाता है।

एक भाई की बेरुखी का सबब भी नहीं जान पाती,

और दूजी पराई होकर भी बड़ा मान है पाती।

एक अपनी बदनसीबी की बात भी नहीं कर सकती,

और दूजी खुशनसीबी का चमकता ताज़ पाती है।

लोग इस बदनसीब बहन को बुआ कहते है,

कहने वाले कभी कभी इसे दुआ कहते हैं।

पर कोई नहीं जानता यह कितने शूल पाती है,

जब इसके ही भाई के द्वारा यह भुला दी जाती है।

और दूजी खुशनसीब कोई और नहीं होती,

उसको सब मौसी कहते है।

बुआ कितना भी दुलार करले भतीजी से,

पर लोग मौसी को ही मां सी कहते हैं।

इस अदालत में कोई सुनने वाला नहीं बुआ का,

आज दिल दुख तो यह ख्याल आया।

क्योंकि एक तो पराई आई जो उसको अपना नहीं पाई,

और दूजा भाई जो अपना था अपना-सा रह नहीं पाया...

अपना-सा रह नहीं पाया...



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