आज हर गली मोहल्ले में बहुत शोर है,
हर गली कोई हत्यारा, तो कोई चोर है।
किताबों में नैतिकता भरी है कूट कूट कर
और हकीकत में अनैतिकता का दौर है।
कोशिश तो बहुत की हमने अपने जज़्बात रखने की,
पर कोशिश गर दूसरे को समझने की की होती...
तब बात कुछ और होती!
हर रिश्ते की एक मर्यादा होती थी पहले
पर अब जाने वो कहां खो गई हैं।
रिश्ता हो या आंख हो कोई ,
सब जाने अनजाने बेदम सी हो गई हैं।
कोशिश तो बहुत की हमने हमेशा मुस्कुराने की,
पर कोशिश गर दूसरे की मुस्कान बनने की की होती...
तब बात कुछ और होती!
आगे बढ़ने की कोशिश हरदम की,
और अपनों से आज़ादी की लड़ाई में मर गए।
आज़ाद होकर अपने वज़ूद के लिए लड़े,
और देखते देखते खुद को अकेला कर गए।
कोशिश तो बहुत की हमने अपना वज़ूद बचाने की,
पर चिंता गर दूसरे के वज़ूद की की होती...
तब बात कुछ और होती!
मकान बना लिए महलों की तरह,
और उनको रिश्तों की जगह पुतलों से सजा लिया।
अपनी उलझनों में उलझे इस क़दर कि
अपनों को ही अपना दुश्मन बना लिया।
कोशिश तो बहुत की हमने दुश्मन मिटाने की,
पर कोशिश गर रिश्ते बचाने की की होती...
तब बात कुछ और होती!
बेटी बनी तो मां से शिकायत रही,
मां बनी तो सास से।
सच यह है हमें शिकायत रही है,
खुद से ही की गई आस से।
कोशिश तो बहुत की है हमने रूठकर अहमियत पाने की,
पर कोशिश गर किसी टूटे को जोड़ने की की होती...
तब बात कुछ और होती।
इस दुनिया में सयानी बेटी ही नहीं, सयाने बेटे का भी
घर पर टिकना किसी बाप को नहीं सुहाता।
खुद जैसा भी रहा हो पति अपने जमाने में,
दामाद का बुरा होना किसी बाप को नहीं भाता।
कोशिश तो बहुत की है हमने सत्संगी व्यक्ति को पाने की,
पर कभी खुद को सत्संगी बनाया होता...
तब बात कुछ और होती!
चुनिंदा बनने की कोशिश में
गलतियों का पुलिंदा बन गए।
दूसरों को गिराने की कोशिश में,
शर्म बेच हम शर्मिंदा बन गए।
कोशिश तो बहुत की हमने सत्कार पाने की,
पर कोशिश गर संस्कार पाने की की होती...
तब बात कुछ और होती!
जिंदगी के किसी किरदार को,
जो कभी निभाते शिद्दत से।
तो पा लेते उस हर खुशी को,
जिसकी चाह थी हमें मुद्दत से।
कोशिश तो बहुत की हमने अपनी किस्मत बन खुदा बनने की,
पर गर कोशिश उस खुदा को पाने की की होती...
तब बात कुछ और होती!
तब बात कुछ और होती!
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