वजह मुस्कुराने की ढूंढती तो
शायद ही कभी मुस्कुरा पाती।
आज बेवजह मुस्कुराती हूँ,
तो लोग ढूंढते हैं कि इसके मुस्कुराने की वजह क्या है।
मैं भी मुस्कुराने की जगह खिलखिलाती हूँ,
जो हूँ भी नहीं सबको दिखाती हूँ।
गूंजती है जब मेरी यह खिलखिलाहट पूरे जहां में
कैसे नाखुश में खुश रह सकते है सबको जताती हूँ।
सच तो यह है कि जो रोती तो आंसुओं को पोछने कोई नहीं आता,
पर आज हंसती हूँ तो उस मुस्कान की भी चुभन सबको होती है।
और मैं ...और मैं मजबूर, मजबूरी में भी कह नहीं सकती कि
ऐसी झूठी जिंदगी से मुझको घुटन होती है...
ऐसी झूठी जिंदगी से मुझको घुटन होती है...
Comments
Post a Comment