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’जी की चाह’

थक गई हूं ढूंढते हुए खुद को,

अब तो खो जाने का जी करता है।

झूठी मुस्कान से थके लवों को

खुश्क अश्कों से सीने का जी करता है।


खुशनसीब है वो जो तन्हा रहते है,

मेरा तो महफिल-ए-तन्हाई से जी डरता है।

शब्दों को कहने की हिम्मत नहीं मुझमें,

और दिल-ए-तहखाने में उन्हें रखने से जी डरता है।


बस नम होती जो यह आँखें तो कोई पोछ भी देता,

कोई कर ही क्या सकता है जब अनदेखा-सा जी बरसता है।

मेरे मरने पर चार काँधे मुझे मिल भी जाएंगे,

पर सच तो यह है कि आज सिसकने के लिए एक काँधे को भी जी तरसता है।


हालात यूं हैं कि मेरे जी ने भी मुझे अब समझाना छोड़ दिया है 

कि उसका जी भी एक संवेदना भरा आज़ाद परिंदा है।

यहां तो उसे भी अब बस सुपुर्दे खाक की चिंता है,

जो राख बन बस गंगाजल पीने की चाह में जिंदा है...

जो राख बन बस गंगाजल पीने की चाह में जिंदा है...

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