नर से भारी नारी
यह वाक्य आपने भी सुना होगा।
अपनी अपनी कसौटी में कसा होगा,
माना ऐसा करने में आपका अपना कुछ भाव रहा होगा।
पर चलिए आज कुछ चर्चा करते है,
अपने श्रम, अपने समय का खर्चा करते है।
जो देते रहे अब तक हमें अपना हर पल हर क्षण
उनको कुछ आदर, कुछ सम्मान आज हम भी देते हैं।
क्या कहा - क्यों देते हैं?
क्यों देते हैं - आज समझाती हूं,
अपने हृदय की बात बतलाती हूं।
एक बार फिर से मैं बोलूंगी-
नर से भारी नारी,
आगे की पंक्ति मैं जोड़ूंगी
तन से भारी, मन से भारी, श्रम से भारी।
तन से भारी
यह बात सुन आप ज़रूर मुस्काए होंगे,
मन में कई चित्र बनाए होंगे।
पर मैं उसका कारण बतलाती हूं,
एक नया नजरिया दिखलाती हूँ।
वो नारी का भार-
विवाह पूर्व वो माता का प्यार,
विवाह उपरांत वो ममता का आधार।
अब इस भार पर नारी की उलाहना मत करना,
नारी के माता के स्वरूप को सदा हृदय में धरना।
अब बारी मन से भारी-
बचपन में आपने सुना होगा
बेटी तो पराया धन है ।
ससुराल गई सुनने लगी
अब यही तेरा नया जीवन है।
वो एक जीवन को भुलाती है,
दूजा जीवन अपनाती है।
गैर कोई जो जन्म से था,
माता पिता वो उनको बनाती है।
कोई उसको अपना माने न माने
वो हर रिश्ते को निभाती है।
सोचिए जीवन में उसके,
कितने संदेह रहे होंगे।
कभी मतभेद, कभी मनभेद
उसने हँसकर के सहे होंगे।
तब कैसे न कहोगे उनको मन से भारी,
एक बार सोचकर आप देखो
क्या पराए घर बिना अपेक्षा आप
कर सकते हो इतनी सेवा सारी।
अब बात श्रम से भारी की करते हैं,
वो रोबोट नहीं पर कम भी नहीं,
माना उसमें पुरुषों सा दम भी नहीं।
वो घड़ी है निरंतर चलने वाली,
उसका रुकने का कोई मौसम भी नहीं।
उससे कौन सा कार्य अछूता है
उससे किसने आराम को पूछा है।
वो घर पर है तो सब हो जाएगा
हर सदस्य को यही भरोसा है।
डॉक्टर बनी, बनी टीचर,
कुश्ती की, पहुंची चाँद पर ।
पर हुई कभी न घर की जिम्मेदारी इधर की उधर।
उसने कौन से कार्य को छोड़ा,
वो रण में गई, वो वन में भी गई,
भरती खुशियां जिस भी जीवन में गई।
अब इससे ज़्यादा क्या श्रम होगा
जिस जीवन में कोई विश्राम नहीं।
फिर भी सुना है मैंने कई बुद्धिजीवियों के अधरों से
अरे ये! खाली हैं ये। इनका कोई काम नहीं।
अब तारीफ़ में इस भारी जीव की मैं क्या बोलूं
वो तो बस त्याग तपस्या की मूरत है।
वो कौन है ज़रा पूछकर देखिए अपने हृदय से,
वो तस्वीर धुंधली है,
पर वो नारी की ही सूरत है...
पर वो नारी की ही सूरत है...
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