'मैं' क्या होता है,
कभी सिखाया नहीं गया हमें।
'मैं' कौन बोलता है,
कभी बताया नहीं गया हमें।
हम वो जाति हैं
जिसे माना जाता है नर से भारी।
पर यहीं पर झलक जाती है,
पुरुषसत्तात्मक समाज की मक्कारी।
तेरा मायका, तेरा ससुराल,
इन शब्दों में पिसती हर नारी।
'मैं' कौन, 'मेरा' घर है कहां,
नहीं आई उसमें कभी यह समझदारी।
आज सोचती हूं तो समझ आता है,
क्यों हमें 'मैं', 'मेरा' शब्द की आदत नहीं डाली गई।
समझ आता है कि हमारे मस्तिष्क में
क्यों 'मैं' से संबंधित कोई ग़लतफहमी नहीं पाली गई।
अगर हम 'मैं' शब्द का अर्थ पहले जान लेती,
शायद खुद में अलग आत्मविश्वास भर पाती।
अपने पिता, भाई, पति से कहीं अधिक सशक्त हो पाती,
शायद पिता पति नहीं हम खुद का घर पा जाती।
चलो छोड़ो, नहीं बताया, तो भी अच्छा किया,
गर इस 'मैं' को हम अपनी जिन्दगी में लाती,
सच तो यह था कि कभी ससुराल को घर न बना पाती।
कभी अपना अपमान न भुला पाती,
पराई दुनिया को अपना जहान न बना पाती।
हम चिरैया बनी बाबुल के आंगन की तो,
पिया के घर को अपना आसमान बना लिया।
कभी सोने के पिंजरे में भी रही तो
उसमें मर्यादा का ताला हमने खुद लगा लिया।
मैं, मेरा फैसला, ऐसी गलतियां न की जो कभी,
तभी नारी - 'मैं खुश हूं!' यह कह पाई है।
पुरुषों को तो अब तक पता भी नहीं,
कि दुनिया में हर लड़ाई 'मैं' की ही उगाई है...
कि दुनिया में हर लड़ाई 'मैं' की ही उगाई है...
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