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मैं अब हर पल की मेहमान हो गई हूं...

कुछ पलों को हम भूले तो, 

कुछ पल हमें भी भूल गए।

आज सोचते हैं क्यों हम उनको भूले, 

और क्यों हमें वो भूल गए।

हर मुस्कुराहट में कुछ पल छूटे,

हर आंसू संग कुछ धुल गए।

कुछ पल अनकहे से बन गए,

कुछ अनसुने से इस फिज़ा में घुल गए।


सोचती हूं क्या होता,

गर सुना होता उन पलों को, 

गर कुछ कहा होता उन पलों को।

कुछ नई याद होती, कुछ नई बात होती,

कुछ और अपने बनते, कुछ और सपने बुनते,

कुछ हकीकत से मुलाकात होती,

दुनिया से कोई नई सांठ-गांठ होती।

कुछ और दिन निकल जाते,

कुछ मतलबी दिल पिघल जाते।


पर बड़े अटपटे से जिंदगी के सवाल होते हैं,

कभी ज़वाब खुद लेकर आते हैं,

तो कभी ज़वाब को रोते है।

कभी जीत कर उनको कोई हार जाता है,

कभी हार कर उनको कोई जीत जाता है।

चलो छोड़ो क्या उनकी सोचों, जिनको पाया नहीं कभी,

चलो छोड़ो क्या उनको बोलों, जिनको सुना नहीं कभी।


अब मान लेती हूं जो पाना था, पा लिया है।

जो खोना था, खो दिया है।

वैसे भी क्या दिया दुनिया ने ऐसा

जिसे लेकर मैं सफर कर सकूंगी,

इसलिए कुछ नहीं ऐसा जिसकी 

मैं अब कदर कर सकूंगी।

खाली हाथ आई थी, खाली हाथ जाऊंगी।

जिंदगी भर का बोझ, मैं राख कर के जाऊंगी।

अब न इस पल, न उस पल की फिकर है,

क्योंकि कोई होंठ नहीं ऐसा जहां मेरी ज़िकर है।

शिकायत नहीं उनसे, न कोई गिला है,

ऐसा कुछ नहीं पास मेरे जो मुझे मेरे मुकद्दर से ज़्यादा मिला है।

फूल को रूप मिला, रंग मिला, मिली खुशबू,

पर वो भी कहां चिर-अनंत तक जी पाता है।

कितना भी हो खुशनुमा कोई पल,

दो पल ठहरता है फिर चला जाता है।

हां दुखों के पलों का कैलकुलेशन

थोड़ा कुछ बिगड़ जाता है।

पर यह भी सच है कि एक जाता है,

तभी दूसरा खड़ा मुस्कुराता है।

पर अब ऐसे रंग बदलते हर पल से मैं अंजान हो गई हूँ,

अब मैं कल, आज और नए कल की मेहमान हो गई हूँ...

हाँ सच अब मैं हर पल की मेहमान हो गई हूँ...

मैं हर पल की मेहमान हो गई हूँ...







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