Skip to main content

कोई खो दे मुझे, मुझे कोई फिकर नहीं है,

मैं खुद को न खो दूं डर लगता है।

खबर नहीं है मेरे साथ कोई है या नहीं है,

मुझे सच में बेज़ार यह पूरा शहर लगता है।

दिखावे की इंतहा इतनी है यहां, आज बताती हूं,

तुम्हें समाज का मटमैला-सा आईना दिखाती हूं।

जिस सच को तुम जानकर भी अंजान बनते हो,

वो सच क्यों है बस यही अफसोस जताती हूं।

आज नींद हो न हो आंखों में पर ,

पलंग पर मखमली बिछौने होने चाहिए।

आज मां बाप हो न हो औलाद संग,

पर खेलने को कीमती खिलौने होने चाहिए।

भूख भोजन की मुश्किल से मिलती है यहां,

पर टेबल पर खाने के हुनर होने चाहिए।

हारने वाले अपनों से प्रेम की दौड़ में,

वसीयतों के शहर में विनर होने चाहिए।

चेहरे के नुक्स छिपाने को यहां बहुत से फैशन हैं,

पर सभी को घाव हृदय के छुपाने की टेंशन है।

राम जाने मां बाप के आंखों के पानी को क्या नाम दूं,

जहां बुढ़ापे की लाठी बेटा नहीं, सरकारी पेंशन है।

पहिया समय का ढो रहा है जीवन की पाषाण-सी देह को,

और चौबीस घंटों की चक्की में पिस रही है आत्मा।

जहां वक्त नहीं है पास, अपने ही मन से मिलने का,

पर दिखावा इतना कि जैसे मिल गया हो परमात्मा।

आज एक दूसरे के पूरक रिश्ते

एक दूसरे के विलोम हो गए हैं।

आज शादी-बरबादी, बच्चे-आबादी, 

तो बूढ़े-ओल्ड एज होम हो गए हैं।

क्रीम की चमक, सिक्कों की खनक, और आज़ादी की सनक,आज के युवा के अरमान हो गए है।

झूठ, मतलब, धोखा, फरेब, आज हर रिश्ते की पहचान हो गए हैं।

प्रेम, स्नेह, अपनत्व,वात्सल्य, हमारे जीवन में मेहमान हो गए हैं।

गैरों की महफिल में मिली गालियों से खुश होने वाले,

अपनों की खिलखिलाहट से भी परेशान हो गए हैं।

मान ले ए-मुसाफिर फर्क नहीं दुनिया को तेरे होने न होने से,

बस तेरे मुतालिक काम होने चाहिए।

तेरे जनाज़े में आंसू कितने बहेंगे कोई मुद्दा नहीं है,

हां बस तेरे बाद दुनिया को तुझसे, मिलने कई कीमती सामान चाहिए...


Comments

Popular posts from this blog

हिंदी की पीड़ा

साल भर बाद आज,  निकलकर वो बाहर आई। मैंने कहा बहन तुमको हिंदी दिवस की बहुत बधाई। और पूरे जोश से पूछा - "कैसी हो हिंदी?" अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन आदि वायरस के बीच, मुझे लगा तुम नहीं बची, पर हर्ष हुआ, तुम तो हो आज भी जिंदी! उसने जो कहा, उसे सुन दिल टूट गया, ऐसा लगा जैसे अपना कोई हो छूट गया। उसका दर्द बड़ा ही गहरा था, उसको गैरों ने नहीं ठगा था, कोई अपना ही था उसे जो लूट गया। उसने कहा- "कैसे कहूं! कैसी है यह हिंदी!" जो थी कभी मां के माथे की बिंदी-सी, अब है थोड़़ी मृत, थोड़ी जिंदी-सी। थोड़ी इंग्लिश हुई, थोड़ी हिंग्लिश हुई, बस थोड़ी ही बची वो हिंदी-सी। बस यह कह वो खामोश हुई, और मुझसे बहुत कुछ कह-सी गई। उसके अलविदा में कोई खुशी न थी, वो गई वहां से पर, कुछ वहीं पर रह-सी गई।  वो सबके लिए एक भाषा है, पर उसको भी हमसे आशा है। सांस उसे कुछ कम-सी हैं, मृत होती वो, उसको बहुत निराशा है। पहले वो बोली, माँ की बोली थी। पूजनीय थी वो जैसे, पूजा के थाल में रोली थी, वो दिए-सी जलती दिवाली थी, वो रंगों से भरी होली-सी थी। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट, और न जाने कितने झूलों में खेली ...

माँ सरिता (नदी)

आज गुरुजनों के सानिध्य में बिताए कुछ पलों में ऐसी शांति मिली कि बहुत दिनों बाद जीवन को समझने को कुछ पल मिल गए। गुरु छाया मुझ पर सदैव बनी रहे।  ❤️❤️ प्रणाम व आभार। यह निर्मल सरिता जो बह रही है, कुछ तो है जो यह मुझसे कह रही है। फुर्सत इसे समझने की आज मिली है, मुझ तुच्छ मनुष्य की यही तो संगदिली है। पहली बात -  कभी यह शोर मचाती है , कितनी ताकत है इसमें दर्शाती है। उस पल इसे देखना, ए दोस्त! अपनी रजतसदृश चमक से  सूरज को भी पछाड़ जाती है। तब यह हुंकार भरती है, चुनौतियों से प्यार करती है। उस पल मानो राह की शिला भी पसीना पसीना हो इससे डरती है। माँ समतुल्य सरिता मुझको सिखा रही थी, डरना नहीं मेरे लाल, चुनौती की किसी शिला से मैं जो चुल्लू में नहीं समा सकती मुझे भी बिना टकराए कभी रास्ता नहीं मिला रे... कभी रास्ता नहीं मिला रे.... दूसरी बात -  अब कहीं यह खामोश रहती है यूं लगता है कि कितनी सरलता से बहती है। पर उस हर पल में भी  कुछ तो है जो यह सहती है, पर मेरे मित्रों! वो यूहीं चुपचाप नहीं रहती है। तुम समझ न सके पर वो -  कभी हंसती , कभी रोती है। कभी वो दिन रात जगती है, कभी...

कोई शुभकामना कुबूल न होगी...

नारी तुम तो नारी हो, न अबला न बेचारी हो। लक्ष्मी हो तुम, तुम ही विद्या हो, तुम ही नवदुर्गा शक्ति स्वरूपा हो। जिंदगी का आरंभ तुमसे, जिंदगी का अंत तुम हो। इक मकान का मालिक होता है पुरुष पर, उसको घर बनाने का मंत्र, नारी तुम हो। तुम न अपनों से हारी हो, न तुम अपने सपनों की मारी हो। तुम हर काम की शुरुआत हो  और तुम हर जंग की तैयारी हो। नारी तुम तो नारी हो। ये जो बोला सब सच है क्या, क्या इसमें रत्तीभर का भी झूठ नहीं? सच बताओ तुम सर्वेसर्वा हो इस जग की या इस तेरे जग में, तेरे घर में तेरी कोई पूछ नहीं। एक बार मनन करके देखो, जैसा कहती हूँ वैसा करके देखो - एक बार सुंदर-सुकुमल बनना, तुम देखना, तुम तब भी कुचली जाओगी। फिर सबल सुदृढ़ बनकर देखना, तुम तब भी ताने पाओगी। साल भर रोने वाली तू नारी तुम कुछ नहीं बस भोली हो! तुम्हें हर मज़ाक में सिरदर्द कहने वालों की तुम हर मर्ज की गोली हो। तुम घर की लाज शर्म हया हो, तो कभी दिल बहलाने वाली अदा हो। कभी सात फेरों की वफ़ा हो, तो कभी घर बचाने वाली सदा हो। तुम जिम्मेदारी उठाने वाला कांधा हो, तुम बॉस की फटकार निकालने का जरिया हो। तुम कभी उसकी गलतियों का पुतला हो...