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दो कौड़ी का मोल

पापा की परी थी जो कभी 

जो थी कभी मां की लाडली।

वो क्यों मुरझा गई इस आंगन में,

जो उस आंगन में थी खिलती कली।

जिसने ठोकर खाई पर डांट नहीं,

आज चलती है दौड़ती है, पर लानत ही मिलती है।

जिसने कभी पकाया नहीं था पर कभी भूखी न रही थी,

आज क्यों पकाकर भी उसकी रोटी हॉटकेस में ठंडी ही मिलती है।

अपनी कीमत कब पूछी उसने,

पर हर कोई बताता रहता है।

इंसान है वो या कोई बिकाऊ चीज़ नहीं वो,

जो हर कोई उसकी कीमत लगाता रहता है।

एक धरोहर समझ पालता है,

तो दूसरा जागीर समझ लेता है।

एक दान कर महान बनता है 

तो दूसरा उस महानता की कीमत

दो कौड़ी बता देता है।

इस बात का जवाब बस इतना है,

जब तक थी मैं मेरे पापा की परी 

मैं थी अनमोल, अनमोल थे मेरे बोल।

जब से बनी मैं तेरी जोरू,

मेरा रह गया बस दो कौड़ी का मोल...

दो कौड़ी का मोल...











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