इन कानों को कुछ आहट सी हुई,
जिसको जो कहना था सब कह दिया।
जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया।
कलम कुछ लिख नहीं पाई,
स्याही का धब्बा सा रह गया।
जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया।
मुस्कुराहट की कोशिश थी हँसी बनने की
अधूरी नम पलकों सा रह गया।
जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया।
ख़लिश मोहब्बत की महसूस हुई,
फ़साना झूठे अफ़साने सा रह गया।
जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया।
मय्यत में मेरी खूब चित्कार हुआ,
शमशान सुनसान सा रह गया।
जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया।
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