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अच्छा ही हुआ जो तुम बस एक हुए

गांधी तुम तो बस एक हुए,

हो सकता है तुम नेक हुए।

पर किस्मत अपनी फूटी है

नेहरू जिन्नाह तो अनेक हुए।

गांधी तुम तो बस एक हुए...


मां का एक अंग तुम काट दिए,

चाचा और जिन्नाह में बांट दिए।

क्या बस उन दो के ही थे तुम बापू,

जो ऐसी तुम सांठ गांठ किए।

गांधी तुम तो बस एक हुए...


तब न जाने कितने थे कत्ल हुए,

अमर्यादित जुल्मों से कितने ही घर बेजार हुए।

एक भारत श्रेष्ठ भारत का स्वप्न आंखों में लिए

कितने ही लोग बेघर और बेकार हुए।

गांधी तुम तो बस एक हुए...


तुम सही से बंटवारा भी कर न सके,

सीमा नहीं बस दिलों के तुमने दो फाड़ किए।

पूछती है आज आतंक से डरी हर सांस,

काहे को भविष्य से तुम खिलवाड़ किए।

गांधी तुम तो बस एक हुए...


कैसी प्यास थी उन दोनों की,

सोचो किस तरह बुझाया तुमने उसे।

वो प्यास आज भी दिनों दिन बढ़ने में है,

क्या वो फिर वैसे ही बुझेगी जैसे बुझाया तुमने उसे।

गांधी तुम तो बस एक हुए...


सुखदेव, भगत, आज़ाद, अशफाक मिलें,

पर नेहरू जिन्नाह से न फिर लाल मिलें।

अब न वो पल दोबारा आए,

जब फिर मेरी मां पर छुरियाँ चलें।

गांधी तुम तो बस एक हुए...


सत्य और अहिंसा के पथ पर चलूंगी मैं,

बस कोई तलवार न मेरी मां के सीने को छुए।

बस दिल बहलता है मेरा इस ख्याल से कि 

अच्छा ही हुआ जो तुम बस एक हुए...

अच्छा ही हुआ जो तुम बस एक हुए...






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