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कागज़ कलम सा है रिश्ता हमारा,

जो मैं हूं लहर तो तुम हो किनारा।

सुख रहा तो घिरी हर समय मैं रही पर,

विपदा आई तो नाम याद आया तुम्हारा।

जब दुनिया कहती थी मुझको बेचारी,

तब तुम ही एकमात्र बने थे सहारा।

सब तुमको बुलाते थे कितने ही नामों से,

पर वो मैं हूं जिसने तुम्हें बस शिक्षक पुकारा।


ज्ञान का अक्षर वो पहला मुझे तुमने सिखाया,

गलत जो भी किया मैंने, वो तुमने मिटाया।

माता-पिता सा अधिकार मैंने तुमको दिया,

तुमको ईश्वर से भी मैंने ऊंचा बताया।

मतलबी इस दुनिया की कंटीली राहों पर, 

ऐ गुरु! तूमने ही झूठ से मुझको लड़ना सिखाया।

जाने कितने ही कष्टों में तुमने दिन वो होंगे बिताए,

पर सच की राह पर तुमने मुझको चलना सिखाया।


ऐ गुरु! मेरी ऊंगली कभी मत छोड़ना,

बिन तेरे भवसागर में, मैं डर जाऊंगी।

कोरा कागज़ मैं, मैं जिस दिन भी भर जाऊंगी,

नाम तेरा अमर मैं कर जाऊंगी।

यह देह माटी की है, मिट जाएगी एक दिन,

पर जो तूने सिखाया वो युगों तक चलेगा।

गुरु-दक्षिणा में मैं बस यह वचन देती हूं,

मेरे ज्ञान को कभी कोई गलत न कहेगा...

मेरे ज्ञान को कभी कोई गलत न कहेगा...







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