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औरत का अपना अस्तित्व

पसंद था मुझे करना मेरे सास-ससुर की तीमारदारी,

करना अपने बच्चों की दिन-रात पहरेदारी।

पसंद थी मुझे कैद-सी वो रंगीन चारदीवारी,

मेरा जीवन ही बन गया था संभालना घर की जिम्मेदारी।

मुझे साड़ी में सजना-संवरना पसंद था,

पसंद था मुझे अपने उनसे नाजों-नखरा करना।

चल जाता था ननद का सासू के कान भरना, 

और पसंद था देवर का बात-बात पर मज़ाक करना।


गर कुछ नापसंद था मुझे तो वो था

मेरी कर्तव्यपरायणता को अनदेखा कर, 

मेरी जिम्मेदारियों को नगण्य बताना।  

छोटी छोटी गलती पर सुनाना मां-बाप का ताना।

संस्कारों को औरत के पैरों की बेड़ी बनाना,

और शराबी-जुवारी मर्दों का औरत को बात-बात पर उसकी औकात बताना।

वो बेवजह का तिरस्कार व उलाहना,

नापसंद था मुझे इस तरह औरत के वजूद पर वार करना।

उसकी जिंदगी से भी कीमती उसकी अस्मत को,

यूं सरे बाज़ार बेरहमी से तार-तार करना।


बस यही वजह थी जो पड़ा मुझ औरत को अपनी चौखट लांघना,

बस यही वजह थी जो पड़ा मुझ औरत को अपना हक मांगना।

किसी को नीचा दिखाने की मेरी कोई मंशा नहीं थी कभी,

कोशिश थी मेरी बस औरत होकर औरत का अपना अस्तित्व बचाना...औरत का अपना अस्तित्व बचाना...








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