भाई-भाभी कहे अब अपने घर करना बक-बक,
कहे ननद-देवर यहां तेरा नहीं है कोई हक।
मां कहे क्या ऐसे ही सास सामने ज़ुबान चलाएगी,
सास कहे वही खाएगी जो अपने संग लेकर आएगी।
जाने क्यों लोग मायके ससुराल से मेरे अधिकार मिटाते हैं ।
जाने क्यों लोग बेटियों पर इतना एहसान जताते हैं...
पति कहे - मुझसे, कैसे जुबान चलाती है?
पढ़ी लिखी होने का क्या, मुझ पर रौब जमाती है।
मैं जो भी करूं वो ठीक है, मुझसे ऊंची आवाज़ में बात मत करना,
चाहे उसकी आवाज़ से मेरी बच्ची मेरे आँचल में छिप जाती है।
जाने क्यों ये लोग मुझे मूक बधिर बंधन में बांधे जाते हैं।
जाने क्यों लोग बेटियों पर इतना एहसान जताते हैं...
आस-पड़ोस के भी क्या हैं कहने,
शादी होते ही देखने आ जाते हैं गहने ।
चाहे खुद की बेटी निक्कर में पब जाए,
पर मुझको टोके, नई नवेली तू, तू सूट क्यों है पहने?
जाने क्यों ये लोग मेरे ससुरालियों के कान भरने आ जाते हैं।
जाने क्यों लोग बेटियों पर इतना एहसान जताते हैं...
जिस घर लेती जन्म वो पराया समझ पालते हैं।
जिस घर आती होकर विदा वो पराया समझ संभालते हैं।
ससुराल में किसी से कुछ कहना संकोच भरा-सा लगता है,
और मायके से कुछ बोलो तू उनका चेहरा भी डरा डरा-सा लगता है।
जाने क्यों शादी होते ही रिश्ते ऐसे बदल जाते हैं।
जाने क्यों लोग बेटियों पर इतना एहसान जताते हैं...
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