वो टूटी चप्पल, वो टपकती छत,
खाना मांगा तो बोले- अरे! हट, परेशान मत कर।
अपना हाल पूछने वाला कोई न था,
किसी को फर्क न पड़ता गर हम जाते भी मर।
तब न था कोई रुपया किताब कलम लाने को,
और न था अम्मा बाबा की कमाई का कोई ठौर।
तब जब पानी पी पीकर पेट भरने का था दौर
तब उस वक्त तो हम पर किसी ने नहीं किया था गौर।
इतने सालों से पेट काट-काट कर मां-बाप ने हमको पढ़ाया,
इतने सालों रंगीली होली और चमकीली दिवाली को हमारा मन ललचाया।
इतने सालों से वो महंगे फैशन को, अपने सपनों में ही पाया,
तब जाकर इतने सालों की तपस्या का फल आज हमने पाया।
हां! आज बुलंदी जब छुई मैंने,
तब पीछे सारा बैरी जग आया।
दिल पर छुरिया चल रही थी उस वक्त जब मैंने,
अपनी उपलब्धि पर उनका झूठा आभार जताया।
तब मेरी हालत समझ, मेरी अम्मा ने मुझको पास बुलाया,
अपनी-सी इस दुनिया का सच्चा रूप मुझे दिखलाया।
अनपढ़ मेरी माई ने अपनी बोली में बतलाया,
चार पंक्तियां कुछ यूं, बोल मुझे समझाया-
कुम्हार न पूजा, माटी न पूजी, पर घड़े को पूजन सब गए।
कुएं पोखर बस लगे तबहि प्यारे, जब पानी से भर गए।।
मोल नहीं कुछ पेड़ का, अनमोल लगे जब फल लद गए।
पत्थर भी गए बस तबहि पूजे, जब मंदिर में बस गए।।
जब मंदिर में बस गए.......
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