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पेड़ों के भूत, वर्तमान व भविष्य को राख में मिला देता है .....

यह बात कुछ पुरानी-सी है,

हम सबके लिए एक कहानी-सी है।

पर आज के इस खास दिन, 

मुझे आप तक यह बात पहुँचानी भी है।

एक वक्त था जब सूरज की तपिश, 

नीम-पीपल-वट वृक्षों से ढक जाती थी।

एक वक्त था जब भड़कते मेघ की कहानी, 

इठलाती-नदी बक जाती थी।

एक वक्त था जब सांसों का मरहम,

बहती सुहानी-हवा बन जाती थी।

एक वक्त था जब हल की मेहनत से खुश हो,

मिट्टी उसके नाम सोने-सी फसल कर जाती थी। 

एक वक्त था जब चूल्हे का धुआँ, 

रोटी की खुशबू से महकता था।

एक वक्त था जब हर गली - हर आंगन, 

तितली फिरती और भंवरा भटकता था।

एक वक्त था जब हर त्योहार आम-केले के पत्तों और 

रंग-बिरंगे फूलों बिन अधूरा-सा लगता था।

एक वक्त था जब प्रकृति की हर झलक में

ईश्वर का ही प्रतिबिंब-सा दिखता था।


बात बस इतनी-सी है मित्रों कि

आज का इंसान साल के तीन-सौ-चौसठ दिन 

पेड़ काट पैसा कमाने या मकान सजाने की बात करता है।

और बस पाँच जून के आज के एक दिन हर किसी से 

एक पेड़ लगा पृथ्वी को हरा-भरा बनाने का बेहूदा मज़ाक करता है।

पेड़ की कमी से आए पृथ्वी के बुखार को 

इंसान कंक्रीट, एसी व गाड़ी के धुएं से और बड़ा देता है। 

इंसान खुद की मतलबी जिंदगी के दिए को जलाने के लिए 

मासूम-पेड़ों के भूत, वर्तमान व भविष्य को राख में मिला देता है .....

राख में मिला देता है .....









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