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Showing posts from June, 2022

जाने क्यों लोग बेटियों पर इतना एहसान जताते हैं...

भाई-भाभी कहे अब अपने घर करना बक-बक, कहे ननद-देवर यहां तेरा नहीं है कोई हक। मां कहे क्या ऐसे ही सास सामने ज़ुबान चलाएगी, सास कहे वही खाएगी जो अपने संग लेकर आएगी। जाने क्यों लोग मायके ससुराल से मेरे अधिकार मिटाते हैं । जाने क्यों लोग बेटियों पर इतना एहसान जताते हैं... पति कहे - मुझसे, कैसे जुबान चलाती है? पढ़ी लिखी होने का क्या, मुझ पर रौब जमाती है। मैं जो भी करूं वो ठीक है, मुझसे ऊंची आवाज़ में बात मत करना,  चाहे उसकी आवाज़ से मेरी बच्ची मेरे आँचल में छिप जाती है। जाने क्यों ये लोग मुझे मूक बधिर बंधन में बांधे जाते हैं। जाने क्यों लोग बेटियों पर इतना एहसान जताते हैं... आस-पड़ोस के भी क्या हैं कहने, शादी होते ही देखने आ जाते हैं गहने । चाहे खुद की बेटी निक्कर में पब जाए, पर मुझको टोके, नई नवेली तू, तू सूट क्यों है पहने? जाने क्यों ये लोग मेरे ससुरालियों के कान भरने आ जाते हैं। जाने क्यों लोग बेटियों पर इतना एहसान जताते हैं... जिस घर लेती जन्म वो पराया समझ पालते हैं। जिस घर आती होकर विदा वो पराया समझ संभालते हैं। ससुराल में किसी से कुछ कहना संकोच भरा-सा लगता है, और मायके से कुछ बोलो त...

पत्थर भी गए बस तबहि पूजे, जब मंदिर में बस गए।।

वो टूटी चप्पल, वो टपकती छत, खाना मांगा तो बोले- अरे! हट, परेशान मत कर। अपना हाल पूछने वाला कोई न था, किसी को फर्क न पड़ता गर हम जाते भी मर। तब न था कोई रुपया किताब कलम लाने को, और न था अम्मा बाबा की कमाई का कोई ठौर। तब जब पानी पी पीकर पेट भरने का था दौर तब उस वक्त तो हम पर किसी ने नहीं किया था गौर। इतने सालों से पेट काट-काट कर मां-बाप ने हमको पढ़ाया, इतने सालों रंगीली होली और चमकीली दिवाली को हमारा मन ललचाया। इतने सालों से वो महंगे फैशन को, अपने सपनों में ही पाया, तब जाकर इतने सालों की तपस्या का फल आज हमने पाया। हां! आज बुलंदी जब छुई मैंने, तब पीछे सारा बैरी जग आया। दिल पर छुरिया चल रही थी उस वक्त जब मैंने,  अपनी उपलब्धि पर उनका झूठा आभार जताया। तब मेरी हालत समझ, मेरी अम्मा ने मुझको पास बुलाया, अपनी-सी इस दुनिया का सच्चा रूप मुझे दिखलाया। अनपढ़ मेरी माई ने अपनी बोली में बतलाया, चार पंक्तियां कुछ यूं, बोल मुझे समझाया- कुम्हार न पूजा, माटी न पूजी, पर घड़े को पूजन सब गए। कुएं पोखर बस लगे तबहि प्यारे, जब पानी से भर गए।। मोल नहीं कुछ पेड़ का, अनमोल लगे जब फल लद गए।  पत्थर भी गए बस ...

औरत का अपना अस्तित्व

पसंद था मुझे करना मेरे सास-ससुर की तीमारदारी, करना अपने बच्चों की दिन-रात पहरेदारी। पसंद थी मुझे कैद-सी वो रंगीन चारदीवारी, मेरा जीवन ही बन गया था संभालना घर की जिम्मेदारी। मुझे साड़ी में सजना-संवरना पसंद था, पसंद था मुझे अपने उनसे नाजों-नखरा करना। चल जाता था ननद का सासू के कान भरना,  और पसंद था देवर का बात-बात पर मज़ाक करना। गर कुछ नापसंद था मुझे तो वो था मेरी कर्तव्यपरायणता को अनदेखा कर,  मेरी जिम्मेदारियों को नगण्य बताना।   छोटी छोटी गलती पर सुनाना मां-बाप का ताना। संस्कारों को औरत के पैरों की बेड़ी बनाना, और शराबी-जुवारी मर्दों का औरत को बात-बात पर उसकी औकात बताना। वो बेवजह का तिरस्कार व उलाहना, नापसंद था मुझे इस तरह औरत के वजूद पर वार करना। उसकी जिंदगी से भी कीमती उसकी अस्मत को, यूं सरे बाज़ार बेरहमी से तार-तार करना। बस यही वजह थी जो पड़ा मुझ औरत को अपनी चौखट लांघना, बस यही वजह थी जो पड़ा मुझ औरत को अपना हक मांगना। किसी को नीचा दिखाने की मेरी कोई मंशा नहीं थी कभी, कोशिश थी मेरी बस औरत होकर औरत का अपना अस्तित्व बचाना...औरत का अपना अस्तित्व बचाना...

पेड़ों के भूत, वर्तमान व भविष्य को राख में मिला देता है .....

यह बात कुछ पुरानी-सी है, हम सबके लिए एक कहानी-सी है। पर आज के इस खास दिन,  मुझे आप तक यह बात पहुँचानी भी है। एक वक्त था जब सूरज की तपिश,  नीम-पीपल-वट वृक्षों से ढक जाती थी। एक वक्त था जब भड़कते मेघ की कहानी,  इठलाती-नदी बक जाती थी। एक वक्त था जब सांसों का मरहम, बहती सुहानी-हवा बन जाती थी। एक वक्त था जब हल की मेहनत से खुश हो, मिट्टी उसके नाम सोने-सी फसल कर जाती थी।  एक वक्त था जब चूल्हे का धुआँ,  रोटी की खुशबू से महकता था। एक वक्त था जब हर गली - हर आंगन,  तितली फिरती और भंवरा भटकता था। एक वक्त था जब हर त्योहार आम-केले के पत्तों और  रंग-बिरंगे फूलों बिन अधूरा-सा लगता था। एक वक्त था जब प्रकृति की हर झलक में ईश्वर का ही प्रतिबिंब-सा दिखता था। बात बस इतनी-सी है मित्रों कि आज का इंसान साल के तीन-सौ-चौसठ दिन  पेड़ काट पैसा कमाने या मकान सजाने की बात करता है। और बस पाँच जून के आज के एक दिन हर किसी से  एक पेड़ लगा पृथ्वी को हरा-भरा बनाने का बेहूदा मज़ाक करता है। पेड़ की कमी से आए पृथ्वी के बुखार को  इंसान कंक्रीट, एसी व गाड़ी के धुएं से और बड़ा द...