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" पापा ! क्या आज ऑक्सीजन सिलिंडर मिल पाया है |"

                          " पापा ! क्या आज ऑक्सीजन सिलिंडर मिल पाया है |"


कुछ वक़्त बीते मदर डे सभी ने बड़ी धूमधाम से मनाया |
तब जाने कहाँ से मुझे एक और माँ का ख्याल आया |
ये वो नहीं जिसने कोरोना में अपना एक लाल खोया है ,
ये वो नहीं जिसके आँचल तले एक बीमार सोया है ,
ये वो नहीं जो कोस रही है अस्पताल या प्रशासन को ,
ये वो नहीं जो तरस रही है ऑक्सीजन के आश्वासन को |
चौंको मत ! यह ना आसमान से टपकी है ,
ना धरा से पैदा हुई है ,
ये वो नहीं जिसकी ऊँगली पकड़ सीखा तूने चलना,
ये वो है जिसके सहारे तेरे वंश का हर इंसान चला है |
ये वो नहीं जिसने तेरे लिए सेकीं हो रोटियाँ ,
ये वो है जिसने तेरे लिए अन्न और खनिज रूपी कितना ही धन उगला है |
आज अस्पतालों को मैंने उस माँ पर तंज कसते देखा ,
जहाँ हर कोई ऑक्सीजन को रो रहा है |
इस माँ से पूछ उसकी पीड़ा जिसका आँचल जिससे भरा था 
आज उसका हर बच्चा उसी चीज़ की कमी से अपनी जान खो रहा है |
आज कोरोना ने कुछ ऐसा देखा- अनदेखा सा सच दिखलाया है 
कल, हर शाम, घर लौटे पिता से बच्चा-बच्चा पूछेगा कि-
"पापा ! अच्छी साँस लिए बरसों बीत गए ,
क्या आज ऑक्सीजन सिलिंडर मिल पाया है |"
"क्या आज ऑक्सीजन सिलिंडर मिल पाया है |"

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