' व्यस्त है आदमी '
व्यस्त है आज आदमी धन कमाने में ,खुद की खुशी से, खुद की खुशी को, खुद से भुलाने में |
कहा नहीं उसको किसी ने कि - तो शमा की तरह जल,
पर शौक है तेरा खुद अपनी व अपनों के भावों की चिता जलाने में |
तू व्यस्त है आज खुद, खुद की बसाई बस्ती मिटाने में ......
इस तरह व्यस्त है आदमी खुद, खुद की हस्ती मिटाने में .......
माना आज तेरा सारा काम मशीनें करती हैं ,
पर बता दूँ एक बात वो किसी से प्यार करती नहीं हैं |
प्यार केवल रिश्तों में होता है, प्यार केवल रिश्तों से मिलता है ,
पर तू कहता है ये मशीन कभी कुछ करती ही नहीं हैं |
तू भाव मिटाकर व्यस्त है अपने रिश्तों को गँवाने में .....
इस तरह व्यस्त है आदमी खुद, खुद की गृहस्थी मिटाने में .....
तू क्यों नहीं सोचता थोड़ा कुछ वक्त कमा लूँ ,
थोड़ा कुछ डूबते रिश्तों को बचा लूँ |
अपने लिए कुछ फ़ुर्सत के पल निकाल लूँ ,
कुछ अपने भाव व कुछ अपना वजूद बचा लूँ |
मशीन बनाते-बनाते, जुट गया है तू खुद को मशीन बनाने में |
इस तरह व्यस्त है आदमी खुद, खुद आदमी की कृति मिटाने में ......
इस तरह व्यस्त है आदमी खुद, खुद आदमी की कृति मिटाने में .......
इस ब्लॉग में मैं किसी को दोष नहीं दे रही क्योंकि खुद कई महीनों बाद आज मैं खुद के लिए कुछ वक्त निकाल पाई हूँ | आप सभी पाठकों से निवेदन है कि कुछ फ़ुर्सत के पल अपने व अपनों के लिए ज़रूर निकालें | देखिएगा आपके सपने अपने-आप पूरे होते जाएँगे |

Beautifully expressed Usha.
ReplyDeleteThank you ma'am
ReplyDeleteआपकी कविताएं हमेशा प्रेरित करती है।
ReplyDeleteधन्यवाद ।
Thank you ma'am
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