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Showing posts from January, 2026

जय भारती

मेरे देश की मैं क्या तारीफ करूं यहां नदियां देवी सी बहती हैं। यहां जन्मे कई भगत सिंह और कलाम, और गली गली में लक्ष्मी नीरजा रहती हैं। मेरे देश की मैं क्या तारीफ करूं यह पूरी दुनिया का संगम है। मेरी मां पर आंख उठा दे कोई किसमें कहां ऐसा दम है। मेरे देश की मैं क्या तारीफ करूं है राधा-कृष्ण का प्यार यहां। यह अमन प्रेम की नगरी है,  है कुटिल मन का संहार यहां। इस माटी की हवा भी  हमें पल-पल याद दिलाती है। यह सांगा प्रताप की भूमि है, यह भय से नहीं, रक्त से पूजी जाती है। तीन रंग का हमारा तिरंगा  हमारे जज्बातों की कहानी है । यह यूं तो शीतल जल की धारा है, यह यूं तो ममता का आंचल सारा है, यह यूं तो धर्मों का आलिंगन है, यह यूं तो बुद्धि मतों का चिंतन है।  पर वक्त पड़े तो, पर वक्त पड़े तो  यह वीरों की रवानी है।  जो देश प्रेम पर मर मिट जाए  ऐसी इस देश की जवानी है। मैं भी हाड़ मांस का पुतला हूं पर मुझे सियाचीन न गला पाया। सब पैंतीस डिग्री से डरते हैं  पर मुझे बाड़मेर भी न जला पाया।   धन्य हूं मैं मैंने ऐसे देश में जन्म पाया, इसका प्यार मेरी रगों में लहू ब...

विदेश की धरती पर हिंदी

कभी भारतवर्ष की पहचान होने वाली मैं हिंदी, अब यहां कुछ अनजानी-सी हो गई हूँ। विदेशी भाषाओं के बढ़ते दखल से, मैं भूसे के ढेर में सुई समान-सी खो गई हूँ। अब खुद से मिलने, मुझे विदेशों में पड़ता है जाना, वहां मौजूद है अब भी कहीं कहीं मेरा ठिकाना । यूँ तो मुझे बोलने वालों की संख्या भारत में ज़्यादा हैं, पर मेरा अस्तित्व विदेशों में ही मान पाता है। मेरे अपने घर में तो मुझे नालायक कम अक्ल आंका जाता है, वहीं विदेशों में मुझे देशभक्ति का सूचक माना जाता है। अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, रसियन, चाइनीज, जैपनीज के बाद, यहाँ मेरी जन्मभूमि में मेरा नंबर आता है। वर्ष भर की हीनता का शिकार मुझ हिंदी को, सरकारी कागजों व सम्मेलनों में ही सम्मान मिल पाता है। और विदेशों में! विदेशों में हिंदी भारत से जुड़े रहने का जरिया है, हिंदी-हिंदी भाई-भाई पराए मुल्क में अपनत्व को दर्शाता है। विदेश में अपनों की कमी का जख्म, मात्र हिंदी रूपी भाषा के मरहम से ही भर जाता है। कुछ कॉलोनियों व घरों में वहां हिंदी ही भजन का सूचक है हिंदी का प्रयोग करते ही दिन त्योहार सा बन जाता है। ओ! भारत के हिंदीभाषी! - दिल पर हाथ रखकर मेरे प्रश्नो...

सच में खुशी क्या है?

'खुश हूँ मैं या नहीं' मुझे समझ नहीं आता, मुझे पता ही नहीं खुशी की क्या है परिभाषा? कभी लगता है सब कुछ पाने में खुशी है, कभी लगता है खुशी तब है जब सब है छूट जाता। कभी चंद रंगीन कागज़ की चमक खुशी लगती है, कभी देह पर इत्र की खुशबू खुशी लगती है। कभी खुशी भूख में मिली सुखी रोटी सी दिखती है, तो कभी लगता है खुशी रेडी, ठेलों व बाज़ारों में बिकती है। कभी खुशी मलमल या नर्म सिल्क का टुकड़ा लगती है, तो कभी खुशी उस अजनबी का मुझसे मिलता दुखड़ा लगती है। चेहरे पर कुछ न लगाती हुई मेरे चेहरे की शक्ल मेरी खुशी है, तो कभी नील को छिपाती उसकी क्रीम उसकी खुशी बन चमकती है। मैं बच्चों की याद में तड़पती हुई,  रेत-सी चमकीली खुशी को खोती हुई, अपनी जिंदगी में तन्हाई का बीज बोती हुई, अपने फ़र्ज़ को अपने ग़म का मर्ज़ बनाती हूँ, कई बच्चों को कामयाबी का मतलब हँसकर बताती हूँ। मंजिल पाने के लिए घरों से दूरी करनी पड़ती है, और घरों की आड़ में अपनों से दूरी बढ़ती है, पर लक्ष्य पाने की आस मैं उनमें हर पल जागती हूँ, कोई बताओ मुझे भी! क्या मैं उन्हें यह सब सही पढ़ाती हूँ। मैं एक रोशनी को चंद्रमा समझ उसके पीछे चलती रही, ...