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Showing posts from October, 2024

दो कौड़ी का मोल

पापा की परी थी जो कभी  जो थी कभी मां की लाडली। वो क्यों मुरझा गई इस आंगन में, जो उस आंगन में थी खिलती कली। जिसने ठोकर खाई पर डांट नहीं, आज चलती है दौड़ती है, पर लानत ही मिलती है। जिसने कभी पकाया नहीं था पर कभी भूखी न रही थी, आज क्यों पकाकर भी उसकी रोटी हॉटकेस में ठंडी ही मिलती है। अपनी कीमत कब पूछी उसने, पर हर कोई बताता रहता है। इंसान है वो या कोई बिकाऊ चीज़ नहीं वो, जो हर कोई उसकी कीमत लगाता रहता है। एक धरोहर समझ पालता है, तो दूसरा जागीर समझ लेता है। एक दान कर महान बनता है  तो दूसरा उस महानता की कीमत दो कौड़ी बता देता है। इस बात का जवाब बस इतना है, जब तक थी मैं मेरे पापा की परी  मैं थी अनमोल, अनमोल थे मेरे बोल। जब से बनी मैं तेरी जोरू, मेरा रह गया बस दो कौड़ी का मोल... दो कौड़ी का मोल...

जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया

इन कानों को कुछ आहट सी हुई, जिसको जो कहना था सब कह दिया। जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया। कलम कुछ लिख नहीं पाई, स्याही का धब्बा सा रह गया। जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया। मुस्कुराहट की कोशिश थी हँसी बनने की अधूरी नम पलकों सा रह गया। जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया। ख़लिश मोहब्बत की महसूस हुई, फ़साना झूठे अफ़साने सा रह गया। जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया। मय्यत में मेरी खूब चित्कार हुआ, शमशान सुनसान सा रह गया। जीवन मेरा कोरा कागज़ कोरा ही रह गया।

अच्छा ही हुआ जो तुम बस एक हुए

गांधी तुम तो बस एक हुए, हो सकता है तुम नेक हुए। पर किस्मत अपनी फूटी है नेहरू जिन्नाह तो अनेक हुए। गांधी तुम तो बस एक हुए... मां का एक अंग तुम काट दिए, चाचा और जिन्नाह में बांट दिए। क्या बस उन दो के ही थे तुम बापू, जो ऐसी तुम सांठ गांठ किए। गांधी तुम तो बस एक हुए... तब न जाने कितने थे कत्ल हुए, अमर्यादित जुल्मों से कितने ही घर बेजार हुए। एक भारत श्रेष्ठ भारत का स्वप्न आंखों में लिए कितने ही लोग बेघर और बेकार हुए। गांधी तुम तो बस एक हुए... तुम सही से बंटवारा भी कर न सके, सीमा नहीं बस दिलों के तुमने दो फाड़ किए। पूछती है आज आतंक से डरी हर सांस, काहे को भविष्य से तुम खिलवाड़ किए। गांधी तुम तो बस एक हुए... कैसी प्यास थी उन दोनों की, सोचो किस तरह बुझाया तुमने उसे। वो प्यास आज भी दिनों दिन बढ़ने में है, क्या वो फिर वैसे ही बुझेगी जैसे बुझाया तुमने उसे। गांधी तुम तो बस एक हुए... सुखदेव, भगत, आज़ाद, अशफाक मिलें, पर नेहरू जिन्नाह से न फिर लाल मिलें। अब न वो पल दोबारा आए, जब फिर मेरी मां पर छुरियाँ चलें। गांधी तुम तो बस एक हुए... सत्य और अहिंसा के पथ पर चलूंगी मैं, बस कोई तलवार न मेरी मां के सीने...