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Showing posts from September, 2025

बुआ की बदनसीबी

यूं तो हमने कोई अंतर नहीं, हम दोनों ही बहने हैं। पर एक कुछ कह भी नहीं सकती, और दूजी के क्या कहने हैं। शिकवा शिकायत करने की  एक में ताकत नहीं। और दूजी को शिकायत का  कोई मौका मिलता ही नहीं। उन दोनों में बस एक ही अंतर है, एक भाई की बहन है और दूजी भाई की साली और उसकी बीवी की बहन है। एक का रिश्ता दूसरे घर जाते ही, भाई की नजरों में फीका पड़ जाता है। और दूजी का बहन के पराए घर जाने पर भी रुतबा पहले से और ज़्यादा बढ़ जाता है। एक भाई की बेरुखी का सबब भी नहीं जान पाती, और दूजी पराई होकर भी बड़ा मान है पाती। एक अपनी बदनसीबी की बात भी नहीं कर सकती, और दूजी खुशनसीबी का चमकता ताज़ पाती है। लोग इस बदनसीब बहन को बुआ कहते है, कहने वाले कभी कभी इसे दुआ कहते हैं। पर कोई नहीं जानता यह कितने शूल पाती है, जब इसके ही भाई के द्वारा यह भुला दी जाती है। और दूजी खुशनसीब कोई और नहीं होती, उसको सब मौसी कहते है। बुआ कितना भी दुलार करले भतीजी से, पर लोग मौसी को ही मां सी कहते हैं। इस अदालत में कोई सुनने वाला नहीं बुआ का, आज दिल दुख तो यह ख्याल आया। क्योंकि एक तो पराई आई जो उसको अपना नहीं पाई, और दूजा भाई जो ...

हिंदी की पीड़ा

साल भर बाद आज,  निकलकर वो बाहर आई। मैंने कहा बहन तुमको हिंदी दिवस की बहुत बधाई। और पूरे जोश से पूछा - "कैसी हो हिंदी?" अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन आदि वायरस के बीच, मुझे लगा तुम नहीं बची, पर हर्ष हुआ, तुम तो हो आज भी जिंदी! उसने जो कहा, उसे सुन दिल टूट गया, ऐसा लगा जैसे अपना कोई हो छूट गया। उसका दर्द बड़ा ही गहरा था, उसको गैरों ने नहीं ठगा था, कोई अपना ही था उसे जो लूट गया। उसने कहा- "कैसे कहूं! कैसी है यह हिंदी!" जो थी कभी मां के माथे की बिंदी-सी, अब है थोड़़ी मृत, थोड़ी जिंदी-सी। थोड़ी इंग्लिश हुई, थोड़ी हिंग्लिश हुई, बस थोड़ी ही बची वो हिंदी-सी। बस यह कह वो खामोश हुई, और मुझसे बहुत कुछ कह-सी गई। उसके अलविदा में कोई खुशी न थी, वो गई वहां से पर, कुछ वहीं पर रह-सी गई।  वो सबके लिए एक भाषा है, पर उसको भी हमसे आशा है। सांस उसे कुछ कम-सी हैं, मृत होती वो, उसको बहुत निराशा है। पहले वो बोली, माँ की बोली थी। पूजनीय थी वो जैसे, पूजा के थाल में रोली थी, वो दिए-सी जलती दिवाली थी, वो रंगों से भरी होली-सी थी। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट, और न जाने कितने झूलों में खेली ...