नर से भारी नारी यह वाक्य आपने भी सुना होगा। अपनी अपनी कसौटी में कसा होगा, माना ऐसा करने में आपका अपना कुछ भाव रहा होगा। पर चलिए आज कुछ चर्चा करते है, अपने श्रम, अपने समय का खर्चा करते है। जो देते रहे अब तक हमें अपना हर पल हर क्षण उनको कुछ आदर, कुछ सम्मान आज हम भी देते हैं। क्या कहा - क्यों देते हैं? क्यों देते हैं - आज समझाती हूं, अपने हृदय की बात बतलाती हूं। एक बार फिर से मैं बोलूंगी- नर से भारी नारी, आगे की पंक्ति मैं जोड़ूंगी तन से भारी, मन से भारी, श्रम से भारी। तन से भारी यह बात सुन आप ज़रूर मुस्काए होंगे, मन में कई चित्र बनाए होंगे। पर मैं उसका कारण बतलाती हूं, एक नया नजरिया दिखलाती हूँ। वो नारी का भार- विवाह पूर्व वो माता का प्यार, विवाह उपरांत वो ममता का आधार। अब इस भार पर नारी की उलाहना मत करना, नारी के माता के स्वरूप को सदा हृदय में धरना। अब बारी मन से भारी- बचपन में आपने सुना होगा बेटी तो पराया धन है । ससुराल गई सुनने लगी अब यही तेरा नया जीवन है। वो एक जीवन को भुलाती है, दूजा जीवन अपनाती है। गैर कोई जो जन्म से था, मात...