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Showing posts from March, 2025

नारी क्यों है भारी?

 नर से भारी नारी  यह वाक्य आपने भी सुना होगा। अपनी अपनी कसौटी में कसा होगा, माना ऐसा करने में आपका अपना कुछ भाव रहा होगा। पर चलिए आज कुछ चर्चा करते है, अपने श्रम, अपने समय का खर्चा करते है।  जो देते रहे अब तक हमें अपना हर पल हर क्षण  उनको कुछ आदर, कुछ सम्मान आज हम भी देते हैं। क्या कहा - क्यों देते हैं?  क्यों देते हैं - आज समझाती हूं, अपने हृदय की बात बतलाती हूं। एक बार फिर से मैं बोलूंगी-  नर से भारी नारी, आगे की पंक्ति मैं जोड़ूंगी  तन से भारी, मन से भारी, श्रम से भारी। तन से भारी  यह बात सुन आप ज़रूर मुस्काए होंगे, मन में कई चित्र बनाए होंगे। पर मैं उसका कारण बतलाती हूं, एक नया नजरिया दिखलाती हूँ। वो नारी का भार-  विवाह पूर्व वो माता का प्यार, विवाह उपरांत वो ममता का आधार। अब इस भार पर नारी की उलाहना मत करना, नारी के माता के स्वरूप को सदा हृदय में धरना। अब बारी मन से भारी-  बचपन में आपने सुना होगा बेटी तो पराया धन है । ससुराल गई सुनने लगी अब यही तेरा नया जीवन है। वो एक जीवन को भुलाती है, दूजा जीवन अपनाती है। गैर कोई जो जन्म से था, मात...

'मैं'

'मैं' क्या होता है, कभी सिखाया नहीं गया हमें। 'मैं' कौन बोलता है, कभी बताया नहीं गया हमें। हम वो जाति हैं जिसे माना जाता है नर से भारी। पर यहीं पर झलक जाती है, पुरुषसत्तात्मक समाज की मक्कारी। तेरा मायका, तेरा ससुराल, इन शब्दों में पिसती हर नारी। 'मैं' कौन, 'मेरा' घर है कहां, नहीं आई उसमें कभी यह समझदारी। आज सोचती हूं तो समझ आता है, क्यों हमें 'मैं', 'मेरा' शब्द की आदत नहीं डाली गई। समझ आता है कि हमारे मस्तिष्क में क्यों 'मैं' से संबंधित कोई ग़लतफहमी नहीं पाली गई। अगर हम 'मैं' शब्द का अर्थ पहले जान लेती, शायद खुद में अलग आत्मविश्वास भर पाती। अपने पिता, भाई, पति से कहीं अधिक सशक्त हो पाती, शायद पिता पति नहीं हम खुद का घर पा जाती। चलो छोड़ो, नहीं बताया, तो भी अच्छा किया, गर इस 'मैं' को हम अपनी जिन्दगी में लाती, सच तो यह था कि कभी ससुराल को घर न बना पाती। कभी अपना अपमान न भुला पाती, पराई दुनिया को अपना जहान न बना पाती। हम चिरैया बनी बाबुल के आंगन की तो, पिया के घर को अपना आसमान बना लिया। कभी सोने के पिंजरे में भी रही तो...