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Showing posts from December, 2024

तभी तुझे शुभ नव वर्ष कहना, प्रिय मित्र मेरे ठीक रहेगा...

मैं कैसे इसे नव वर्ष कहूं, बस तारीख ही तो बदली है। हाल वही बेहाल यहां, न बदला झूठ, न हकीकत बदली है। तीन शब्दों की खुशी यहां, पर परिवारों में निराशा है। बेरोजगारी, भुखमरी कहीं, कहीं मदहोश तमाशा है। न शर्म, अदब अब बचा यहां, न रिश्तों की मर्यादा है। सुनो मित्र अब मुझे बताओ ऐसे नव वर्ष का क्या फ़ायदा है। मतलब की इस दुनिया में, हैप्पी न्यू ईयर भी मतलबी लगा। सुनो मित्र तुम मुझे बताओ, कौन नहीं यहां जिसने तुम्हें ठगा। कम या ज़्यादा की बात नहीं, पैसों का खेल निराला है। जो है अमीर सुख उसका है, वर्ना गरीब की किस्मत में तो  लिखा जहर का प्याला है। पढ़ा लिखा यहां अनपढ़ है, और अनपढ़ यहां के राजा हैं। खाना डिब्बों में बासी यहां, पर खबरें यहां पर ताज़ा हैं। सुनो मित्र तुम मुझे बताओ, कितने दिन बच्चों के संग बिताए हो। तुमने उनको छोड़ा बचपन में, या तुम बुढ़ापे में उनके सताए हो। है स्वर्ग कहीं तो वो भी हैं यहीं, है नर्क कहीं तो वो भी है यहीं। तुम किस लोक के वासी हो, बस प्रश्न उठता है ये यहीं। अरे! राख बने तुम विचर रहे, या नदी में बह नाले में मिले। तुम पर चढ़ता है हार कौन-सा तुम्हारे स्वर्ग-नर्क की बात ...

मैं अब हर पल की मेहमान हो गई हूं...

कुछ पलों को हम भूले तो,  कुछ पल हमें भी भूल गए। आज सोचते हैं क्यों हम उनको भूले,  और क्यों हमें वो भूल गए। हर मुस्कुराहट में कुछ पल छूटे, हर आंसू संग कुछ धुल गए। कुछ पल अनकहे से बन गए, कुछ अनसुने से इस फिज़ा में घुल गए। सोचती हूं क्या होता, गर सुना होता उन पलों को,  गर कुछ कहा होता उन पलों को। कुछ नई याद होती, कुछ नई बात होती, कुछ और अपने बनते, कुछ और सपने बुनते, कुछ हकीकत से मुलाकात होती, दुनिया से कोई नई सांठ-गांठ होती। कुछ और दिन निकल जाते, कुछ मतलबी दिल पिघल जाते। पर बड़े अटपटे से जिंदगी के सवाल होते हैं, कभी ज़वाब खुद लेकर आते हैं, तो कभी ज़वाब को रोते है। कभी जीत कर उनको कोई हार जाता है, कभी हार कर उनको कोई जीत जाता है। चलो छोड़ो क्या उनकी सोचों, जिनको पाया नहीं कभी, चलो छोड़ो क्या उनको बोलों, जिनको सुना नहीं कभी। अब मान लेती हूं जो पाना था, पा लिया है। जो खोना था, खो दिया है। वैसे भी क्या दिया दुनिया ने ऐसा जिसे लेकर मैं सफर कर सकूंगी, इसलिए कुछ नहीं ऐसा जिसकी  मैं अब कदर कर सकूंगी। खाली हाथ आई थी, खाली हाथ जाऊंगी। जिंदगी भर का बोझ, मैं राख कर के जाऊंगी। अब न ...
कोई खो दे मुझे, मुझे कोई फिकर नहीं है, मैं खुद को न खो दूं डर लगता है। खबर नहीं है मेरे साथ कोई है या नहीं है, मुझे सच में बेज़ार यह पूरा शहर लगता है। दिखावे की इंतहा इतनी है यहां, आज बताती हूं, तुम्हें समाज का मटमैला-सा आईना दिखाती हूं। जिस सच को तुम जानकर भी अंजान बनते हो, वो सच क्यों है बस यही अफसोस जताती हूं। आज नींद हो न हो आंखों में पर , पलंग पर मखमली बिछौने होने चाहिए। आज मां बाप हो न हो औलाद संग, पर खेलने को कीमती खिलौने होने चाहिए। भूख भोजन की मुश्किल से मिलती है यहां, पर टेबल पर खाने के हुनर होने चाहिए। हारने वाले अपनों से प्रेम की दौड़ में, वसीयतों के शहर में विनर होने चाहिए। चेहरे के नुक्स छिपाने को यहां बहुत से फैशन हैं, पर सभी को घाव हृदय के छुपाने की टेंशन है। राम जाने मां बाप के आंखों के पानी को क्या नाम दूं, जहां बुढ़ापे की लाठी बेटा नहीं, सरकारी पेंशन है। पहिया समय का ढो रहा है जीवन की पाषाण-सी देह को, और चौबीस घंटों की चक्की में पिस रही है आत्मा। जहां वक्त नहीं है पास, अपने ही मन से मिलने का, पर दिखावा इतना कि जैसे मिल गया हो परमात्मा। आज एक दूसरे के पूरक रिश्ते एक द...