मैं कैसे इसे नव वर्ष कहूं, बस तारीख ही तो बदली है। हाल वही बेहाल यहां, न बदला झूठ, न हकीकत बदली है। तीन शब्दों की खुशी यहां, पर परिवारों में निराशा है। बेरोजगारी, भुखमरी कहीं, कहीं मदहोश तमाशा है। न शर्म, अदब अब बचा यहां, न रिश्तों की मर्यादा है। सुनो मित्र अब मुझे बताओ ऐसे नव वर्ष का क्या फ़ायदा है। मतलब की इस दुनिया में, हैप्पी न्यू ईयर भी मतलबी लगा। सुनो मित्र तुम मुझे बताओ, कौन नहीं यहां जिसने तुम्हें ठगा। कम या ज़्यादा की बात नहीं, पैसों का खेल निराला है। जो है अमीर सुख उसका है, वर्ना गरीब की किस्मत में तो लिखा जहर का प्याला है। पढ़ा लिखा यहां अनपढ़ है, और अनपढ़ यहां के राजा हैं। खाना डिब्बों में बासी यहां, पर खबरें यहां पर ताज़ा हैं। सुनो मित्र तुम मुझे बताओ, कितने दिन बच्चों के संग बिताए हो। तुमने उनको छोड़ा बचपन में, या तुम बुढ़ापे में उनके सताए हो। है स्वर्ग कहीं तो वो भी हैं यहीं, है नर्क कहीं तो वो भी है यहीं। तुम किस लोक के वासी हो, बस प्रश्न उठता है ये यहीं। अरे! राख बने तुम विचर रहे, या नदी में बह नाले में मिले। तुम पर चढ़ता है हार कौन-सा तुम्हारे स्वर्ग-नर्क की बात ...