मैं आज़ाद हूँ सोचकर मैंने पंख फैलाए थे, आँख खुली तो पाया वो नीले आसमान तो मेरे सपने में आये थे। तू सुकून में है सोच मुझे जन्नत सी खुशी मिलती है, मैं संतुष्ट हूँ कि मैंने अपने नियम तेरी सहमति से बनाए थे। तू निश्चिंत था सोचकर कि तूने मेरे पंख पकड़े हैं, पर तुझे खबर नहीं वो निशान मेरे गले पर दिख रहे हैं। गम को देते देते बक्शीश हम थक गये हैं, और तू कहता है कि हम खुशी खरीदने में बिक गये हैं। अब न अश्क़ बचें हैं, न सिसकियां बचीं हैं, न कोई मुलाकात करता है, न हिचकियां बचीं हैं। जीने की ख्वाहिश की खबर लेने वालों तुम क्या जानो बस मरने की आरजू और झिझकियां बचीं हैं। जिस दिन चली गई यह झिझक यकीन मानो एक जनाजा जरूर इस चौखट से उठेगा। आज तन्हा रहने वाली इस रूह को उस पल सड़क से गुजरता हर अंजान राहगीर भी अपना कहेगा... हर अंजान राहगीर भी अपना कहेगा...