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Showing posts from February, 2026

हर अंजान राहगीर भी अपना कहेगा...

मैं आज़ाद हूँ सोचकर मैंने पंख फैलाए थे, आँख खुली तो पाया वो नीले आसमान तो मेरे सपने में आये थे। तू सुकून में है सोच मुझे जन्नत सी खुशी मिलती है, मैं संतुष्ट हूँ कि मैंने अपने नियम तेरी सहमति से बनाए थे। तू निश्चिंत था सोचकर कि तूने मेरे पंख पकड़े हैं, पर तुझे खबर नहीं वो निशान मेरे गले पर दिख रहे हैं। गम को देते देते बक्शीश हम थक गये हैं, और तू कहता है कि हम खुशी खरीदने में बिक गये हैं। अब न अश्क़ बचें हैं, न सिसकियां बचीं हैं, न कोई मुलाकात करता है, न हिचकियां बचीं हैं। जीने की ख्वाहिश की खबर लेने वालों तुम क्या जानो बस मरने की आरजू और झिझकियां बचीं हैं। जिस दिन चली गई यह झिझक यकीन मानो एक जनाजा जरूर इस चौखट से उठेगा। आज तन्हा रहने वाली इस रूह को उस पल सड़क से गुजरता हर अंजान राहगीर भी अपना कहेगा... हर अंजान राहगीर भी अपना कहेगा...

वक्त का वक्त

जब वक्त नहीं रुकता कभी, फिर वो मुझे क्यों रोकता है? खुद नहीं हटता पीछे,  तो मुझे क्यों अतीत में झोंकता है? मैं नहीं टोक सकती उसे मुझे पता है, फिर क्यों हर कदम पर वो मुझे टोकता है? अधर में फंँसाकर मेरी जिंदगी को वो क्यों मुस्कुराता हंँसता है? कोई पूछे न पूछे उससे  मेरे साथ उसके इस अन्याय को करने की वजह जो जख्मी है, वो मेरा हृदय है, वो उससे यह प्रश्न पूछता है- मैंने कब कहा था मुझे हर पल मुस्कुराना है? मैंने कब कहा था मुझे हर खुशी को पाना है? मैंने कब कहा था मुझे रहने को महल बनाना है? मैंने कब कहा था मुझे हर ख्वाब को अपना बनाना है? और जो कहती हूँ वो कोई सुनता कहाँ है, मेरे अपनों का सुकून मेरा मुस्कुराना है, झूमना उनका खुशी में मेरा खुशी को पाना है। जहाँ हों मेरे अपने उस झोपड़ी को महल मानती हूँ, उनकी पलकों के हर ख्वाब को ही मैंने अपना बनाना है। मैं सब जानती हूँ, तू भी तो जलन में जलता है, तू भी नहीं देता किसी को सबकुछ क्योंकि तुझे ही कब कहाँ सब-कुछ मिलता है? तुझे अपशब्द कहने वालों की कमी नहीं है, तेरा गुणगान करने वाले तेरा साथ छोड़ देते है कहते हैं तू गिरगिट से भी जल्दी रंग बदलता ह...

बस वक्त बीता है!

छूट गई जिंदगी, जिंदगी की खोज में, खोके जिंदगी मैं आज आई हूँ होश में। बड़ी मुद्दत से उसको चाहूंगी सोचा था, खुद की ख्वाहिश ही भूल गई मैं जोश-जोश में। कभी अभाव की नमी थी आँखों में, आज आँखों में सुकून की कमी है। कौन कहता है मुझे पूरी दुनिया देखनी है, मेरे लिए तो पूरी दुनिया मेरे घर की ही जमीं है। मेरे बच्चों ने जो इस घर में तूफान लाया है, मुझे उसमें भी समंदर-सा मज़ा आया है। उनकी किलकारियों को महसूस किया तो लगा, मेरा खोया हुआ बचपन लौट आया है। जो कहता है यह सब मोह माया है- उससे पूछती हूँ, जब प्रीत नहीं हृदय में तो मानव-जीवन ही क्यों पाया है? क्यों पाषाण-सा बनाकर तुझे भेजा नहीं उसने, जो पाषाण को मानव में बदलने इस ज़मीं पर स्वयं आया है? बदलते वक्त में भाव जरूर बदले हैं, पर हृदय का धड़कना कहां बदल पाया है? वक्त बदला है, वक्त के साथ बदलने के लिए, पर चौबीस घंटों की सीमा कौन बदल पाया है? कभी लगा पैसों से चलती है जिंदगी, तो कभी लगा पैसों ने जिंदगी को मिटाया है? अब उलझन में हूँ मैं कि मैंने जिंदगी में पैसों को खाया है, या इन पैसों ने मेरी जिंदगी को खाया है? जिंदगी की हर रोज की जंग में, मुश्किल है सम...