काहे को आज का यह झूठा प्रचार
पसंद है सबको उसके हाथों का अचार,
पर चुभते हैं सबको उसके आज़ाद विचार ।
पूरे घर को संभालने वाली वो,
वो जो है वास्तव में बेघर लाचार ।
घर के भीतर आज भी जब कोई
करता नहीं उसकी कर्त्तव्यपरायणता का आभार ।
फिर काहे को व्हाट्सऐप का दिखावा,
काहे को आज का यह झूठा प्रचार ।
आज भी आवाज़ उठाने पर जिसे औकात बताई जाती है ,
जन्म लेते ही जो बेटी पराया धन बनकर रह जाती है।
देर रात बाइक पर भाई को आते देख रोमांचित होती है वो ,
पर गर सांयकाल भी गहरा जाए तो घर वापस आने पर वो इतना घबराती है।
आज भी डरती है वो कि कहीं
उसकी अस्मिता पर न हो जाए कोई प्रहार।
फिर काहे को व्हाट्सऐप का दिखावा,
काहे को आज का यह झूठा प्रचार ।
बचपन में बाबुल की ऊंगली,
लड़कपन में भाई का साथ।
ब्याह बाद पति का संरक्षण,
मरते दम तक चाहिए उसे कोई न कोई हाथ।
जब इसी को कहते हो तुम
उसकी सुकून भरी दुनिया संसार ।
फिर काहे को व्हाट्सऐप का दिखावा,
काहे को आज का यह झूठा प्रचार ।
आज भी जिसका तकिया आंसूओं की नमी लिए है,
आज भी जिसका जीवन रंगों की कमी लिए है।
आज भी पंख होने पर भी जिसकी उड़ान के लिए आसमान नहीं है,
और आसमान मिल भी जाए तो ज़मी पर कांटे बिछाने वालों की कमी नहीं है।
हे नर ! जब ऐसा ही करना है तुम्हेंं
हर नारी के साथ व्यवहार।
फिर काहे को व्हाट्सऐप का दिखावा,
काहे को आज का यह झूठा प्रचार ।
जब तक नहीं बदलेगी यह तस्वीर जिंदगी की,
मैं नहीं कर सकती महिला दिवस की शुभकामनाएं स्वीकार।
व्यर्थ है सालभर में एक बार मनने वाला यह त्योहार जब तक,
जननी स्वरूपा को नहीं मिलते हैं, उसके स्वरूप के सभी अधिकार।
हे नर! आज ही कर ले तू
स्वयं में स्वयं से नारायण महिमा का संचार।
फिर न चाहिए होगा व्हाट्सऐप का दिखावा,
न महिला दिवस का यह झूठा प्रचार ...…
न महिला दिवस का यह झूठा प्रचार ........
True and Beautiful
ReplyDeleteRight...
ReplyDeleteGood one
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