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उम्मीदों की कहानी

उम्मीदों की कहानी, बड़ी है पुरानी।
उम्र मेरी जितनी, ये उस से भी पुरानी।
उम्मीदों की कहानी, बड़ी है पुरानी.....

न वज़ूद था मेरा, न कोई उम्मीद थी मेरी,
पर फिर भी जाने क्यों उम्मीदों से ही मेरी जगह बनी।
न दौलत में मैं खेली, न चाँदी के चमचे से खाया,
पर फिर भी जाने क्यों मैं उम्मीदों के होने की वजह बनी।

साँसे पाई मैंने वज़ूद भी पाया,
तभी इन उम्मीदों का अक्स सामने आया।
न जाने कब ये मेरी परछाई बन गयीं,
मुझे इस बात का ख्याल भी न आया।

उम्मीदों की कहानी, बड़ी है पुरानी।
उम्र मेरी जितनी, ये उस से भी पुरानी।
उम्मीदों की कहानी ,बड़ी है पुरानी.....

जब तक मैं उम्मीदों की पहचान जान पाती,
तब तक उम्मीद मेरी पहचान बन गयी।
मैं बनी उम्मीदों से या उम्मीदें मुझसे,
इस सवाल से मैं खुद अनजान बन गयी।

मुकद्दर मेरा उम्मीदें बनी, 
या मैं बनी उम्मीदों का मुकद्दर।
जाने कौन किसका अंत है, 
और कौन किसकी है सहर.....

उम्मीदों की कहानी, बड़ी है पुरानी।
उम्र मेरी जितनी, ये उस से भी पुरानी।
उम्मीदों की कहानी ,बड़ी है पुरानी......

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