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Showing posts from July, 2020

तू हर उस पल से अनजान बन..........

कुछ बात है तो, आज ही कह दो , कल का कोई भरोसा नहीं यारों | जिंदगी में ख्वाब तो बहुत हैं , पर हकीकत निहारने के लिए झरोखा नहीं यारों | माना कल की बात आज कैसे कर सकते हो तुम , पर कम से कम कल का कुछ अनकहा ना रखो | माना कल के ख्वाब आज नहीं देख सकते तुम  , पर कम से कम कल की किसी हकीकत को अनदेखा ना करो | ये ज़िंदगी तेरी मेरी, टिकी है साँसों के दम से , इस ज़िंदगी का एतबार ना कर | जब तुझे प्यार नहीं करती ये , तो तू भी इस ज़िंदगी से प्यार ना कर | मिली है मोहलत तुझे जितने दिन की , उतने दिन खुशी से जी, लाचार ना बन | एक दिन ख़बर सभी को बनना है , उससे पहले तो समाचार ना बन | बनना ही है तुझे कुछ तो, किसी की मुस्कान बन , जिस अपनेपन की शक्ल नहीं, उसकी तू पहचान बन | वक्त आने पर मुकर जाने की तेरी इस फितरत से , आज इसी पल से, तू हर उस पल से अनजान बन ........... आज इसी पल से, तू हर उस पल से अनजान बन ...........

बस मेरी जान खो गयी है...

कुछ ऐसे पल होते है कि लोग इस दुनिया को छोड़ देते हैं। क्या उन पलों के बारे में और अपनी जिंदगी के बारे में वो कुछ सोचते होंगे....एक नज़र डाल लें उन अधूरे सपनों पर😢😢💐 सुबह की वो ठंडी हवा वही रही, चिड़ियों का चहकना वही रहा। फूलों की खुशबू वही रही, कलियों का खिलना वही रहा। वो नदी का बहना वही रहा, वो कोयल का कूकना वही रहा। वो समंदर की लहरों का उफ़ान वही रहा, वो सैर पर निकले लोगों का चलना वही रहा। वो रोज़ाना का काम वही रहा, वो दिन के टिफ़िन का डब्बा वही रहा। वो लोकल ट्रेन की भीड़ वही रही, वो रात दिन काम का जज़्बा वही रहा। पर मैं मुझे नज़र नहीं आ रहा, जाने मैं हूँ कहाँ खो गया। पहले बहुत सिसकियाँ सुनी कुछ दिन, पर अब सब खामोश हो गया। मैं आईने को देखता हूँ, पर मेरा अक्स दिखता नहीं है। कहीं मेरी फ़ोटो पर हार है, पर वहाँ कोई शख्स टिकता नहीं है। आज यकीन हो गया है, इस दुनिया में मोहब्बत नहीं है। है तो बस जरूरतों से बने जरूरतों के रिश्ते हैं, जिनकी किसी को कोई जरूरत नहीं है। इस दुनिया से रुख़्सती के बाद बस इतना ही है जाना, मेरी मुस्कान वही रही, बस मेरी साँस खो गयी। मेरी जिंदगी वही रही, बस मेरी जान खो गयी.......

उम्मीदों की कहानी

उम्मीदों की कहानी, बड़ी है पुरानी। उम्र मेरी जितनी, ये उस से भी पुरानी। उम्मीदों की कहानी, बड़ी है पुरानी..... न वज़ूद था मेरा, न कोई उम्मीद थी मेरी, पर फिर भी जाने क्यों उम्मीदों से ही मेरी जगह बनी। न दौलत में मैं खेली, न चाँदी के चमचे से खाया, पर फिर भी जाने क्यों मैं उम्मीदों के होने की वजह बनी। साँसे पाई मैंने वज़ूद भी पाया, तभी इन उम्मीदों का अक्स सामने आया। न जाने कब ये मेरी परछाई बन गयीं, मुझे इस बात का ख्याल भी न आया। उम्मीदों की कहानी, बड़ी है पुरानी। उम्र मेरी जितनी, ये उस से भी पुरानी। उम्मीदों की कहानी ,बड़ी है पुरानी..... जब तक मैं उम्मीदों की पहचान जान पाती, तब तक उम्मीद मेरी पहचान बन गयी। मैं बनी उम्मीदों से या उम्मीदें मुझसे, इस सवाल से मैं खुद अनजान बन गयी। मुकद्दर मेरा उम्मीदें बनी,  या मैं बनी उम्मीदों का मुकद्दर। जाने कौन किसका अंत है,  और कौन किसकी है सहर..... उम्मीदों की कहानी, बड़ी है पुरानी। उम्र मेरी जितनी, ये उस से भी पुरानी। उम्मीदों की कहानी ,बड़ी है पुरानी......