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Showing posts from February, 2025

क्या मानव! मानव शब्द के काबिल है...

लगता है कुछ शब्दों को अब शब्दकोश से हटना होगा। वरना उनको उसमें रखना संग उनके बस छल ही होगा। उन शब्दों में प्राण थे कभी बहुत, और कई प्राणों में वो समाए थे। पर आज का परिदृष्य अलग है, ऐसे भी वो कभी न बिसराए थे। आज उनकी पहचान को शायद अनाथाश्रम जाना होगा। या फिर उनका ठिकाना कोई सस्ता सा वृद्धाश्रम होगा। करुणा, दया, प्रेम, शील, मर्यादा, यह शब्द नहीं अब प्रचलित ज़्यादा। ममता मिटा, मिटा वात्सल्य, न जाने आगे अब और क्या है इरादा। जो बोलूं झूठ तो जीभ कटे, तन में मेरे न प्राण रहे। क्यों मानो तुम सच मुझको,  जब ऐसा कह कह सब झूठ कहे। पर हृदय से तुम अपने पूछो, कितने कटु शब्दों से बने हो तुम। कितनी अमर्यादित भाषा में, अपनी आत्मा तक सने हो तुम। जो मर्यादित हो वो बोझिल है, और अमर्यादित जिंदादिल है। समझ नहीं आता मुझको, क्या मानव! मानव शब्द के काबिल है... क्या मानव! मानव शब्द के काबिल है...