जो देखा उसे देखते रह गए, कहीं देर न हो जाए सब ये कह गए। सजाकर उसे हम घर ला गए, अपना लेबल लगा घुमाने लग गए। मेरे कदमों के संग वो चलती रही, जिस तरह से कहा वो ढलती रही। शुरू में मुझे चुभती थी वो, पर अब जैसे कहा वैसे वो बदलती रही। कभी खुश हुए हम तो उसको भी चमका दिया, कभी हुए परेशान तो उसको भी चटका दिया। जिस गली को कहा वो मुड़ गई, न मुड़ी जो तो उसको मैंने पटका दिया। मैंने जितना चलाया वो चलती रही, उसकी उम्र, उसकी खूबसूरती दिनों दिन ढलती रही। पर चूं तक करने की उसमें जब न हिम्मत रही, अपनी फटेहाल जिंदगी को वो सिलवाती रही। जब मन चाहा उसको संग ले लिया, नहीं तो सजाकर घर पर ही रख दिया। उसे तोड़ने छोड़ने की हिम्मत थी मुझमें, जब चाहा जो मुंह आया उसे बक दिया। न सुनी मैंने उसकी, न खातिर की, मेरे घर में उसकी चलती न तूती थी। वो मेरी पत्नी नहीं, न थी घर की औरत कोई, वो तो मेरे पैरों में घिसने वाली मामूली-सी जूती थी। समझने वाले बहुत समझे होंगे पर, उन्हें क्या समझाएं जो खुद बने नासमझ हैं। इन बातों से तस्वीर तुमने भी बनाई तो होगी, पर मेरी समझ तुमसे थोड़ी छोटी समझ है, इसलिए मेरे तसव्वुर में तो बस मेरी जूती महज...